फाइनेंस की दुनिया घाघों से भरी है। शेयर बाज़ार में तो ऐसे लोगों की भरमार है जो मालिकों से जोड़तोड़ करके ऐसी कंपनियों के शेयर निवेशकों के गले मढ़ देते हैं जिनका कोई भविष्य नहीं। इसलिए निवेश की दुनिया में बड़ी सावधानी से कदम बढ़ाएं। एक मोटी-सी सावधानी यह है कि अगर कंपनी के प्रवर्तकों ने अपने शेयर गिरवी रखे हों तो उसमें भूलकर भी निवेश न करें। तथास्तु में आज एक बेहद साफ-सुथरी और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

बड़े लोग पैसे को दांत से दबाकर रखते हैं। बहुत सोच-समझकर चुनिंदा माध्यमों में लगाते हैं। वहीं, समझदार से समझदार नौकरीपेशा लोग भी शेयर बाजार के लंबा फासला बनाकर चलते हैं। किसान को तो हवा ही नहीं कि यह बाजार चलता कैसे है। बाकी जो लोग बचे हैं, जो कभी यहां से तो कभी वहां से थोड़ी-बहुत कमाई कर लेते हैं, वे उड़ती-उड़ती खबरों की तलाश में रहते हैं ताकि शेयर बाजार से ‘पक्की’ कमाई की जाऔरऔर भी

साल 2012 में बाजार का पहला दिन। हर ब्रोकरेज हाउस व बिजनेस अखबार नए साल के टॉप पिक्स लेकर फिर हाजिर हैं। चुनने के लिए बहुत सारे विकल्प सामने हैं। ऐसे में आपको और क्यों उलझाया जाए! हालांकि अगर साल 2011 के टॉप पिक्स का हश्र आपके सामने होगा तो शायद आपने इस हो-हल्ले को कोई कान ही नहीं दिया होगा। इन पर ध्यान देना भी नहीं चाहिए क्योंकि ढोल, झांझ, मजीरा व करताल लेकर यह मंडलीऔरऔर भी

इनफोसिस, एचडीएफसी बैंक, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस और इंडिया इनफोलाइन जैसी 45 से ज्यादा कंपनियों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की शेयरधारिता प्रवर्तकों से ज्यादा हो गई है। स्टॉक एक्सचेंजों के पास उपलब्ध सितंबर तक के आंकड़ों के मुताबिक इनफोसिस की इक्विटी में एफआईआई की हिस्सेदारी 36.66 फीसदी है, जबकि प्रवर्तकों की हिस्सेदारी उनसे 20.62 फीसदी कम 16.04 फीसदी ही है। इसी तरह एचडीएफसी बैंक में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 23.23 फीसदी है, जबकि एफआईआई का निवेश 29.30 फीसदीऔरऔर भी

पिछले दो हफ्तों में रेणुका शुगर्स के शेयर 40 फीसदी से ज्यादा सिर्फ इसलिए नहीं टूटे कि उसे सितंबर 2011 की तिमाही में 57.30 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है, बल्कि इसलिए भी टूटे हैं क्योंकि प्रवर्तकों ने कंपनी में अपनी 38.06 फीसदी इक्विटी हिस्सेदारी का 42.03 फीसदी भाग गिरवी रखा हुआ है। लेकिन ब्रोकरेज फर्म एसएमसी ग्लोबल सिक्यूरिटीज के ताजा अध्ययन से खुलासा हुआ है कि ऐसी कुल 748 कंपनियां हैं जिनके प्रवर्तकों ने अपने शेयरऔरऔर भी

मुर्गा बांग न दे, तब भी सुबह का होना तो नहीं रुकता। इसी तरह सही सलाह न मिलने से लोगों का निवेश करना नहीं रुकता। वे भविष्य की सुरक्षा के लिए अपनी वर्तमान बचत को दांव पर लगाते रहते हैं, जोखिम उठाते रहते हैं। लेकिन कुछ तो नासमझी व लालच का तकाजा और बहुत कुछ हमारे नियामक तंत्र के लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना रवैये के चलते हर दिन लाखों देशवासी करोड़ों गंवा रहे हैं। स्पीक एशिया तो एकऔरऔर भी

एक मोटी-सी बात गांठ बांध लें कि शेयरों का धंधा दुनिया का इकलौता धंधा है जो अकेले किया जाता है। दूसरों के चक्कर में पड़े तो समझिए कि खटिया खड़ी, बिस्तरा गोल। आप इस बात की भी तस्दीक करेंगे कि चैनलों या अखबारों में दी गई एनालिस्टों की दस में आठ सलाहें गलत होती हैं। इसलिए हमारी कोशिश आपको ‘चुटकी भर टिप्स, मुठ्ठी भर मंत्र’ देने की है ताकि आप अपने फैसले खुद कर सकें। हमारी सलाहऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने निजी कंपनियों या उद्योग समूहों को बैंक खोलने की इजाजत देने की तैयारी कर ली है। लेकिन अगर किसी भी कंपनी या समूह की आय या आस्तियों का 10 फीसदी या इससे ज्यादा हिस्सा रीयल एस्टेट या ब्रोकिंग के धंधे से आता है तो उसे बैंक खोलने की इजाजत नहीं होगी। रिजर्व बैंक ने सोमवार को निजी क्षेत्र को नए बैंकों को लाइसेंस देने के लिए जारी प्रारूप दिशानिर्देशों में यह प्रावधान किया है।औरऔर भी

अमेरिका और यूरोप से बराबर कमजोरी की खबरें आती रहीं। भारतीय बाजार नीचे और नीचे होता रहा। दुनिया के बाजारों में गिरावट से भारतीय बाजार में घबराहट बढ़ती गई। शुक्र है कि रिटेल निवेशक अभी तक बाजार से बाहर हैं, इसलिए इस बार भुगतान का कोई संकट नहीं खड़ा हुआ। इस मायने में 2011 का सदमा 2008 के सदमे से भिन्न है। 2008 में बाजार यकीनन ओवरबॉट स्थिति में था, वह भी बड़े पैमाने पर मार्जिन याऔरऔर भी

एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम ने हमें ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया है जहां से गिरावट की गहरी फिसलन का अंदेशा बढ़ गया है। ग्रीस के ऋण संकट को हमने कभी तवज्जो नहीं दी। लेकिन अमेरिका में अगर ऋण अदायगी में चूक हुई तो अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज उसे डाउनग्रेड कर सकती है। इससे अमेरिकी शेयर बाजार में 10 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है और यकीनन इससे भारतीय शेयर बाजार का सारा मिजाज भीऔरऔर भी