अमेरिका की चूक या हमारे लांग-शॉर्ट

एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम ने हमें ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया है जहां से गिरावट की गहरी फिसलन का अंदेशा बढ़ गया है। ग्रीस के ऋण संकट को हमने कभी तवज्जो नहीं दी। लेकिन अमेरिका में अगर ऋण अदायगी में चूक हुई तो अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज उसे डाउनग्रेड कर सकती है। इससे अमेरिकी शेयर बाजार में 10 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है और यकीनन इससे भारतीय शेयर बाजार का सारा मिजाज भी बिगड़ सकता है।

इसलिए हमें अमेरिका के ऋण संकट और अदायगी में चूक के पूरे अभिप्राय को समझना जरूरी है। लेकिन इससे पहले हमें अधिग्रहण संहिता के नए प्रावधानों के लिए सेबी की तारीफ करनी चाहिए। असल में पिछले हफ्ते सेबी के बोर्ड द्वारा मंजूर किए गए अधिग्रहण संबंधी दिशानिर्देशों का निहितार्थ बहुत सारे निवेशक अभी तक नहीं समझ पाए हैं।

कुछ साल पहले रतन टाटा ने टाटा स्टील में अपनी हिस्सेदारी 29 फीसदी से बढ़ाकर करीब 43 फीसदी कर ली। इसलिए क्योंकि तब मीडिया में हल्ला मचा था कि लक्ष्मी निवास मित्तत की निगाहें टाटा स्टील पर लगी हुई है। नए दिशानिर्देशों के मुताबिक कोई भी बाहरी निवेशक लिस्टेड कंपनी में आसानी से 24.99 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है। आईटीसी अभी तक ईआई होटल्स में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती थी। लेकिन वह 14.95 फीसदी से आगे नहीं बढ़ पा रही थी क्योंकि 15 फीसदी होते ही उसे 20 फीसदी का ओपन ऑफर लाना पड़ता। लेकिन अब वह बिना किसी फिक्र के अपनी हिस्सेदारी 24.99 फीसदी तक बढ़ा सकती है। वह इसे जैसे ही 25 फीसदी करेगी, उसे कंपनी के 26 फीसदी शेयर और खरीदने का ओपन ऑफर लाना पड़ेगा।

अगर डीआईआई कंपनी की 25 फीसदी इक्विटी खरीद चुके बाहरी निवेशक को 26 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की सदाशयता दिखा देते हैं तो कंपनी की 51 फीसदी इक्विटी उसके पास आ जाएगी और उसका सारा प्रबंधन उसके हाथ में होगा। ऐसे में कौन प्रवर्तक चाहेगा कि उसकी कंपनी प्रतिकूल अधिग्रहण का शिकार हो जाए? सेबी का नया प्रावधान प्रवर्तकों का अपने ही शेयरों को बाजार में बेचकर उसके भावों को नचाने का मनोविज्ञान ही तोड़ देगा। अब वे दिन लद जाएंगे। प्रवर्तकों को कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर कम से कम 51 फीसदी करनी होगी, नहीं तो घात लगाकर कोई भी शिकारी उसकी कंपनी पर कब्जा कर सकता है।

दूसरी यह भी मजेदार चीज हुई है कि अगर किसी पास दबे हुए मूल्यांकन वाली कंपनियों के 5-10 फीसदी शेयर हैं और उन कंपनियों को किसी ने हथियाने की कोशिश की, तब तो समजिए कि उनकी लॉटरी लग जाएगी। अब तक भारत में बहुत सारे निवेशकों ने इस तरह के प्रतिकूल अधिग्रहण की कोशिश की है। लेकिन कानून उनके साथ नहीं था तो वे कंपनी पर नियंत्रण नहीं हासिल कर सके। लेकिन अब यह स्थिति बदल गई है। यह एक तरह की क्रांति है। कुछ और परिवर्तन हो जाएं तो भारतीय बाजार में वाकई गदर मच जाएगी। जैसे, स्टॉक डेरिवेटिव सौदों में फिजिकल सेटलमेंट आ जाए और पूंजी बाजार में रिटेल निवेशकों को कर-रियायत देकर प्रोत्साहित किया जाए जिससे बचत के इक्विटी शेयरों में लगने की राह खुल जाएगी।

अब वापस अमेरिका के ऋण संकट पर। अमेरिका में ऋण की सीमा एक ऐसी वैधानिक सीमा है। इसी हद तक अमेरिकी सरकार अपने कर्मचारियो, सामाजिक सुरक्षा, हेल्थकेयर खर्च और बांडों पर ब्याज देने के लिए उधार ले सकती है। मौजूदा सीमा 14.3 लाख करोड़ डॉलर की है। 1962 के बाद से यह सीमा 72 बार बढ़ाई जा चुकी है। पिछले दस सालों में ही इसे दस बार बढ़ाया गया है। 1979 में नियम बना दिया गया कि यह सीमा खुद-ब-खुद बढ़ती रहेगी। लेकिन इस साल 2011 में अमेरिकी संसद ने इस नियम को गिरा दिया। इसलिए अब अमेरिकी सरकार को अपनी उधार-सीमा बढ़ाने के लिए संसद में मतदान के जरिए अलग से मंजूरी लेनी पड़ती है।

इस मसले पर फैसला लेने की अंतिम तिथि 2 अगस्त है। ज्यादा संभावना इस बात की है कि यह तिथि आगे खिसका दी जाएगी क्योंकि अमेरिकी सरकार अपने भुगतान कुछ महीने टाल सकती है। इसलिए बाजार अगर 2 अगस्त का टाइम-बम लगाकर बैठा तो उसे थोड़ी निराशा झेलनी पड़ सकती है।

हमारा मानना है कि अमेरिकी ऋण संकट का यह ड्रामा और सदमा 2012 में होनेवाले राष्ट्रपति चुनावों की पूर्व-पीठिका है और ऋण सीमा का बढ़ना तीसरी क्वांटीटेटिव ईजिंग (क्यूई) की ही गांठ खोलेगा। अमेरिका में बेरोजगारी का स्तर 9 फीसदी तक पहुंच चुका है। ऐसे में वहां की सरकार भुगतान में कोई चूक गवारा नहीं कर सकती। पूरी संभावना इस बात की है कि 1962 के बाद 73वीं बार वहां ऋण की वैधानिक सीमा बढ़ा दी जाएगी। इस बीच अमेरिकी जनता टैक्स की दरें बढ़ाने और सरकार खर्च में कटौती का घनघोर विरोध कर रही है। इसलिए अमेरिकी सरकार को क्यूई-3 के तहत नोट छापकर सिस्टम में डालने पड़ेंगे, जिससे वहां मुद्रास्फीति को पलीता लग सकता है।

खैर, हमारा मानना है कि अगर 2 अगस्त को सारा गुड़ गोबर हो गया और अमेरिकी सरकार भुगतान से चूक गई तो निश्चित रूप अमेरिकी शेयरों को डाउनग्रेड कर दिया जाएगा। वैसे भी अमेरिकी बाजार अब तक की रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं और उनका मूल्यांकन बहुत ही ज्यादा चढ़ा हुआ है। इसलिए ऐसी आफत आने में वहां के बाजार 10 फीसदी गिर सकते हैं। निस्संदेह रूप से इसका तगड़ा असर दुनिया के दूसरे तमाम बाजारों पर पड़ेगा और भारत में निफ्टी हाल के न्यूनतम स्तर 5180 तक गिर सकता है।

लेकिन हमें पक्का यकीन है कि अगर ऐसा होता है तो वापसी भी काफी तेज होगी और बाजार फिर से 5500 के ऊपर पहुंच सकता है क्योंकि यह वो स्तर है जहां बाजार ने पिछले एक साल से खुद को बड़े जतन से जमाया है और हमारी राय में यह बहुत उचित मूल्यांकन का स्तर है।

इसके बजाय अगर ऐसा हुआ कि अंतिम तिथि कुछ हफ्ते आगे खिसका दी गई तो निफ्टी 5730 तक जा सकता है। इसकी दो वजहें हैं। एक, बाजार में कोई लांग पोजिशन नहीं है क्योंकि यह घटनाक्रम सेटलमेंट के ठीक पहले सामने आया और निवेशक व ट्रेडर 5500 पर रिस्क उठाने के बजाय 5700 पर खरीदने के लिए प्रीमियम देने का मन बना चुके हैं। दो, मंदड़ियों ने भारी शॉर्ट पोजिशन बना रखी है। अमेरिका भुगतान में चूक करे या न करे, इनको खास स्तर पर जाकर अपनी पोजिशन काटनी ही काटनी है।

हम हमेशा सारी आशंकाओं, समस्याओं व गिरावट के पहलू को आंक कर ही चलते हैं। ऐसे हालात से निपटने का हमारा एक ही सिद्धांत है कि हर गिरावट पर खरीदो क्योंकि बाजार अब भी तेजी के दौर में है।

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