सब्जियों और कुछ दालों के दाम नीचे आने से 30 अप्रैल 2011 को समाप्त सप्ताह में खाद्य मुद्रास्फीति की दर हफ्ते भर पहले की तुलना में 0.83 फीसदी घटकर 7.70 प्रतिशत रह गई। यह पिछले 18 महीनों में खाद्य मुद्रास्फीति का न्यूनतम स्तर है। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य मुद्रास्फीति एक हफ्ते पहले 8.53 फीसदी रही थी। यह लगातार दूसरा सप्ताह रहा है जब खाद्य मुद्रास्फीति में गिरावट दर्ज की गई। एक साल पहले इसी सप्ताहऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने तय किया कि बैंक पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तारीख 31 मार्च को अपनी नेटवर्थ के 10 फीसदी से ज्यादा रकम म्यूचुअल फंडों की लिक्विड स्कीमों में निवेश नहीं कर सकते। मौद्रिक नीति में इस कदम की घोषणा करते हुए रिजर्व बैंक गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा कि इस कदम से बैंकों व म्यूचुअल फंडों के बीच चल रहे सर्कुलर कारोबार को तोड़ने की कोशिश की गई है। बैंक म्यूचुअल फंडों की ऋण आधारितऔरऔर भी

वैसे तो देश के खजाने और मौद्रिक नीति के प्रबंधन का कोई वास्ता किसी आस्था नहीं है। लेकिन रिजर्व बैंक में लगता है कि शीर्ष पर कहीं कोई हनुमान-भक्त बैठा है क्योंकि उसकी सालाना मौद्रिक नीति और हर तिमाही समीक्षा मंगलवार को ही आती रही है। 20 अप्रैल को 2010-11 की सालाना मौद्रिक नीति आई। 27 जुलाई 2010 को पहली समीक्षा, 2 नवंबर 2010 को दूसरी समीक्षा और 25 जनवरी 2011 को तीसरी समीक्षा हुई। इसमें सेऔरऔर भी

देश में बचत खातों के अलावा बैंकों को हर तरह की डिपॉजिट पर ब्याज दर तय करने की छूट को मिले हुए तेरह साल से ज्यादा हो चुके हैं। अब बचत खाते में जमा रकम की ब्याज दर को भी बाजार शक्तियों के हवाले कर देने की तैयारी है। रिजर्व बैंक ने इस विषय में एक बहस-पत्र जारी किया है जिसमें इसके तमाम फायदे-नुकसान गिनाए गए हैं। लेकिन तर्कों का पलड़ा बचत खातों की ब्याज दर कोऔरऔर भी

हर कोई कहे जा रहा था कि रिजर्व बैंक ब्याज दरें 0.25 फीसदी बढ़ा देगा। फिर भी देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई के चेयरमैन ओ पी भट्ट की तरह बाजार को भी लग रहा था कि शायद ऐसा न हो। इसी उम्मीद में बाजार थोड़ा गिरकर तो खुला, लेकिन फिर पूरी तरह सुधर गया, जबकि दुनिया के बाजार गिरे हुए थे। लेकिन 11 बजे के बाद बजार में हवा-सी चल गई कि ब्याज दरें बढ़नी हीऔरऔर भी

निराशावादी चिंतन का कोई अंत नहीं है। निवेश फंडों या ब्रोकरेज हाउसों के सरगना अपने निहित स्वार्थों के चलते बाजार को लेकर जैसी निराशा फैला रहे हैं, उसका भी कोई अंत नहीं है। लेकिन मैं इनकी रत्ती भर भी परवाह नहीं करता क्योंकि मैं कोई ब्रोकिंग के धंधे में तो हूं नहीं। फंड अपने फैसलों को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। कहते हैं कि वे जन-धन का प्रबंधन कर रहे हैं। सच यह है कि फंडऔरऔर भी

बैंकर से लेकर अर्थशास्त्री तक कहे जा रहे हैं कि रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति की मध्य-तिमाही समीक्षा में ब्याज दरें बढ़ा देगा। खासकर फरवरी में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति के उम्मीद से ज्यादा 8.31 फीसदी रहने पर लगभग पक्का माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक नीतिगत दरों यानी रेपो और रिवर्स रेपो दर को 0.25 फीसदी बढ़ाकर क्रमशः 6.75 फीसदी और 5.75 फीसदी कर देगा। लेकिन सूत्रों के मुताबिक रिजर्व बैंक इस बार ऐसाऔरऔर भी

जापान में परमाणु बिजली संयंत्रों में धमाकों के बाद हो रहे रेडियोएक्टिव विकिरण से वहां के जन-जीवन पर खतरा बढ़ता जाएगा। इससे पूरे पूर्वी एशिया की जलवायु तक बिगड़ सकती है। फिर भी यह कारण नहीं बन सकता. बाजार को छोड़कर भाग जाने का। हमेशा देखा गया है कि जब भी कोई संकट आता है कि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) बाजार से बेचकर निकल लेते हैं। अगर मान लें कि वे जापान से बड़े पैमाने पर निवेशऔरऔर भी

जापान में भयंकर भूकंप और सुनामी से जानमाल का भारी नुकसान हुआ है और इसमें सारी दुनिया से जापान को सहयोग व मदद मिलनी चाहिए। हालांकि जापान सरकार ने जिस तरह राहत व बचाव के लिए खटाक से 18,600 करोड़ डॉलर निकाल लिए हैं, वो वाकई सराहनीय कदम है। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि जापान इस संकट से उबर जाएगा, भले ही इसमें थोड़ा वक्त लगे और उसे तकलीफ उठानी पड़े। असल में जापान में पुनर्निर्माणऔरऔर भी