विदेशी संस्थागत निवेशकों का खेल बड़ा व्यवस्थित होता है। कैश सेगमेंट में कोई स्टॉक खरीदा तो डेरिवेटिव सेगमेंट में उसके अनुरूप फ्यूचर्स बेच डाले। दोनों के भाव में 10% सालाना का अंतर हुआ तो वे मजे में आर्बिट्राज करते हैं। उनका लक्ष्य है रुपए डॉलर की विनिमय दर के असर के बाद कम से कम 6-8% कमाकर वापस ले जाना। टैक्स उन्हें देना नहीं होता। जेटली ने कृपा और बढ़ा दी। उनसे सीखते हुए अभ्यास आज का…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में खरीदना तो आसान है, बेचकर निकलना बेहद कठिन। खासकर तब, जब सूचकांक और स्टॉक हर दिन नया शिखर बना रहा हो। पर सुना है, इसका एक सूत्र है। स्टॉक के आरएसआई के अब तक के उच्चतम स्तर और अभी के स्तर का अंतर निकालें। देखें कि वो अंतर उच्चतम स्तर का कितना प्रतिशत है। उतना प्रतिशत स्टॉक के अभी के भाव को बढ़ा दें। वो आपके निकलने का स्तर होगा। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में सब डेरिवेटिव-मय हो चला है। कल एनएसई में कैश सेगमेंट का टर्नओवर 9781 करोड़ रुपए रहा तो डेरिवेटिव्स का 2,14,958 करोड़ रुपए का। कैश टर्नओवर डेरिवेटिव्स का मात्र 4.59 फीसदी! अगर संस्थाओं से हटकर बाकी निवेशकों की बात करें तो उनके 100 रुपए में से 90 रुपए डेरिवेटिव्स में जाते हैं और दस रुपए कैश सेगमेंट में जिसमें से केवल दो रुपए के सौदे डिलीवरी के लिए होते हैं। अब ट्रेडिंग गुरुवार की…औरऔर भी

देश पर लगता है कि डेरिवेटिव ट्रेडिंग का जुनून सवार है। आपको यकीन नहीं आएगा कि वित्त वर्ष 2001-02 से 2012-13 के बीच के ग्यारह सालों में इक्विटी फ्यूचर्स व ऑप्शंस (एफ एंड ओ) में रोज़ का औसत टर्नओवर 71.18 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ता हुआ 420 करोड़ से 1,55,048 करोड़ रुपए पर पहुंच चुका है। अभी कल, 18 अक्टूबर 2013 को एनएसई के एफ एंड ओ सेगमेंट का टर्नओवर 1,67,558 करोड़ रुपए रहाऔरऔर भी

ट्रेडिंग कोई सीधा-सरल सहज नहीं, बल्कि जटिल खेल है। अनिश्चितता की भंवर में आपको फैसला करना होता है। फैसला इस आधार पर कि पल-पल बदलते भावों का पैटर्न क्या है? यह समझ कि भीड़ का झुकाव ठीक इस वक्त किधर है? तेजी और मंदी के खेमे में किसका पलड़ा भारी है? पूंजी बड़ी हो तो खरीदने-बेचने के सौदे साथ कर सकते हैं। लेकिन कम पूंजी में ऐसा मुमकिन नहीं। चलिए करें इस जटिलता को सुलझाने का अभ्यास…औरऔर भी

आप भीड़ का हिस्सा बने रहे, उसी तरह सोचते रहे तो हमेशा वोटर और उपभोक्ता ही बने रहेंगे, नेता-विजेता कभी नहीं बनेंगे। कंपनियां और राजनीतिक पार्टियां आपकी सोच पर अपना साम्राज्य खड़ा करती रहेंगी। आपको अपना बिजनेस खड़ा करना है तो भीड़ की सोच से ऊपर उठना पड़ेगा, भीड़ की सोच से खेलना पड़ेगा। जो ट्रेडर इस खेल में पारंगत हो जाता है, वो ऐश करता है। बाकी आते हैं, क्रैश कर जाते हैं। अब चलें आगे…औरऔर भी

मन को न संभाले तो हर ट्रेडर जुए की मानसिकता का शिकार होता है। मान लीजिए, नौ बार सिक्का उछालने पर टेल आए तो हममें से ज्यादातर लोग मानेंगे कि अगले टॉस में हेड आना पक्का है। जबकि वास्तविकता यह है कि पिछले नौ की तरह दसवें टॉस में भी हेड या टेल की संभावना 50-50% है। इसी मानसिकता में बार-बार नुकसान खाकर हम लंबा दांव खेल सब गंवा बैठते हैं। अब करें सही दांव की शिनाख्त…औरऔर भी

सौ कमाया। सौ गंवाया। रकम बराबर तो कमाने की खुशी और गंवाने का दुख बराबर होना चाहिए। लेकिन हम-आप जानते हैं कि सौ रुपए गंवाने की तकलीफ सौ रुपए कमाने की खुशी पर भारी पड़ती है। इसे निवेश की दुनिया में घाटे से बचने की मानसिकता कहते है। 100 गंवाने का दुख 200 कमाने के सुख से बराबर होता है। इसलिए स्टॉप-लॉस और लक्षित फायदे की लाइन छोटी-बड़ी होती है। मनोविज्ञान का खेल है ट्रेडिंग। अब आगे…औरऔर भी

निफ्टी हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन 1.41 फीसदी बढ़कर 5940 का स्तर तोड़ चुका है। इसलिए अगर कुछ अघट नहीं हुआ तो अब उसे 6000 का लक्ष्य भेदने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। हालांकि इसे 5970 पर तगड़ी बाधा का सामना करना पड़ा। फिलहाल माहौल में आशावाद है। रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भी तस्दीक कर दी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडराते बादल छंट चुके हैं और अगले साल हमारी आर्थिक विकास दर 7 फीसदी से ऊपरऔरऔर भी

कहा जा रहा है कि एफआईआई दुखी हैं। फंड मैनेजर परेशान हैं। हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। गार (जनरल एंटी एवॉयडेंस रूल) और वोडाफोन जैसे सौदों पर पिछली तारीख से टैक्स लगाने से उनको भ्रमित कर दिया है। इस साल जनवरी से मार्च तक हर महीने भारतीय शेयर बाजार में औसतन तीन अरब अरब डॉलर लगानेवाले एफआईआई ठंडे पड़ने लगे हैं। सेबी के मुताबिक उन्होंने अप्रैल में अभी तक इक्विटी बाजार में 10.69 करोड़ डॉलर काऔरऔर भी