सर्दी उतर रही है। लेकिन कोहासा व धुंधलका बढ़ता ही जा रहा है। कहीं कुछ साफ नहीं दिख रहा। जिन बैंकिंग व आईटी कंपनियों में उछाल की बदौलत सेंसेक्स और निफ्टी नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए, इन सूचकाकों में शामिल कंपनियों की सालाना रिपोर्ट ही बताती है कि 83% यौन उत्पीड़न के मामले उन्हीं के खिलाफ हैं। क्या शेयर बाज़ार का निवेशक व ट्रेडर इतना संवेदनहीन है कि मुनाफे के चक्कर में ऐसे अनैतिक आचरण कोऔरऔर भी

इस साल शेयर बाज़ार कभी क्रैश हो गया तो? ऐसा नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। बढ़ता रहे तो बहुत अच्छा। लेकिन धसक गया तो? हमें इसकी तैयारी रखनी ही चाहिए। आंख-कान और दिमाग हमेशा खुला रखना होगा। साथ ही अभी तक के निवेश पर हासिल रिटर्न को कैसे बचा लिया जाए, इसका भी इंतज़ाम कर लेना पड़ेगा। हम जानते हैं कि बाज़ार टूटने पर सबसे ज्यादा माइक्रो-कैप, स्मॉल-कैप और मिड-कैप कंपनियों के शेयर टूटते हैं, जबकिऔरऔर भी

हमारे विशाल देश भारत में रोज़गार की समस्या विकट सच्चाई है। इसे किसी भी जुमले या हवाबाज़ी से नहीं हल किया जा सकता। हमारी आबादी का मीडियम या मध्यमान 28 साल का है। हमें यह भी समझना होगा कि लोगबाग सरकार से नौकरियां नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां चाहते हैं जिनसे रोज़ी-रोज़गार के मौके बढ़ें। मुठ्ठी भर ज्यादा पढ़े-लिखे लोग ही सरकारी नौकरियों के चक्कर में पड़ते हैं और आरक्षण के लिए मारा-मारी करते हैं। बाकी ज्यादातर लोगऔरऔर भी

गजब स्थिति है। सब कुछ ऐड-हॉक है, तदर्थ है। लेकिन जनता को सपना बेचे रहे हैं 1947 में देश को विकसित बनाने का। चुनाव हैं तात्कालिक। भाजपा कार्यकर्ताओं से लेकर अफसरों व कर्मचारियों को उज्ज्वला, आयुष्मान व मुफ्त राशन जैसी सरकारी योजनाओं के प्रचार में झोंक दिया गया है। लेकिन नाम दिया गया है विकसित भारत संकल्प यात्रा। देश में ज़रूरत है कि निजी उद्योगों को शामिल करके रोज़गार की समस्या को युद्धस्तर पर हल किया जाए।औरऔर भी

जिस मानव संसाधन या डेमोग्राफिक डिविडेंड पर हमारी अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार है, वही सबसे ज्यादा उपेक्षित है। देश में 1968 की शिक्षा नीति में तय हुआ था कि केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर हर साल जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करेंगी। 1986 की नीति में भी यही लक्ष्य दोहराया गया। अभी सबसे नई बनी 2020 की शिक्षा नीति में भी वही लक्ष्य दोहराया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि यह लक्ष्य आज तक कभीऔरऔर भी

ज्यादा कर्जदार देश को समृद्ध नहीं माना जा सकता। विकास का अगला पैमाना है कि औसत भारतीय कितना खुशहाल हुआ है? इसे जीडीपी के समग्र आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति जीडीपी से मापा जाएगा। मार्च 2014 में हमारा प्रति व्यक्ति जीडीपी 1559.86 डॉलर था। यह मार्च 2023 में 2612.45 डॉलर रहा है। यह गणना मौजूदा मूल्यों पर की गई है। अगर नौ सालों में औसत मुद्रास्फीति की दर को 5% मानें तो 2014 के 1559.86 डॉलरऔरऔर भी

निरर्थक बहसों में उलझाकर अवाम का ध्यान भटकाया जा रहा है और देश के भविष्य को खतरे में डाला जा रहा है। राजनीति में राम का घटाटोप तो आर्थिक मोर्चे पर जीडीपी के आकार का वितंडा। जीडीपी पांच ट्रिलियन डॉलर हो जाने का मतलब विकास नहीं होता। विकास का मतलब है देश की समृद्धि और औसत देशवासी की खुशहाली। क्या पिछले नौ सालों में देश समृद्ध हुआ है? देश पर मार्च 2014 में आंतरिक व बाहरी, दोनोंऔरऔर भी

एक बात जान लें कि भारत की विकासगाथा को अगले 15-20 साल तक कोई आंच नहीं आने जा रही। घटिया से घटिया सरकार आ जाए, पर हमारे कॉरपोरेट क्षेत्र का बढ़ना तय है। इसलिए लम्बे समय में हमारे शेयर बाज़ार का कुलांचे मारना भी पक्का है। ध्यान रहे कि शेयर बाज़ार हमेशा लहरों में चलता है। कभी नीचे तो कभी ऊपर। नीचे गिरने पर खरीदना और ऊपर जाने पर मुनाफा निकाल लेना। कुशल ट्रेडर या निवेशक कीऔरऔर भी

आलोचनाएं बहुत हो रही हैं। पूरा हिसाब लगाकर बताया जा रहा है कि सरकार 2025 या 2026 में भी भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बना पाएगी। सवाल उठाया जा रहा है कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाना महज राजनीतिक जुमला तो नहीं। लेकिन सरकार मदमस्त हाथी की तरह सारी आलोचनाओं की परवाह किए बिना दावे करती जा रही है। इस बीच मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंतिम बजट की तैयारियां पूरीऔरऔर भी

जब नीयत गलत हो, मंशा में खोट हो तो बड़ी-बड़ी बातों व दावों का कोई मतलब नहीं रह जाता। नौ साल से केंद्र की सत्ता में विराजमान और अगले पांच साल तक सत्ता पाने का यकीन रखनेवाली मोदी सरकार को किसी दूसरे पर यकीन नहीं। वह अपनी सत्ता में बनाए रखने की कुव्वत रखनेवाले चंद लोगों की ही सुनती है और उन पर कोई आंच न आए, इसी की गारंटी देती है। इसके लिए उसने जांच एजेंसियोंऔरऔर भी