मोदी सरकार ने विकास का जो मॉडल देश पर थोपा, उसके केंद्र में किसान, मजदूर, नौजवान या छोटे उद्योग-धंधे नहीं, बल्कि देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र था। उसके मेक-इन इंडिया का नारा था देश में बनाओ, विदेश में बेचो। लेकिन देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र को लग गया कि उसने पूंजी लगाकर बड़े उद्योग खड़े भी कर दिए तो मोदी सरकार उन्हें अदाणी और अम्बानी जैसे यारों को सौंप देगी। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रह्मणियन तक ‘डबल-ए’औरऔर भी

देश का भुगतान संतुलन विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ने से तभी दुरुस्त होगा, जब शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) बढ़ेगा। स्थिति यह है कि मार्च 2026 में खत्म वित्त वर्ष 2025-26 में देश में आया शुद्ध एफडीआई मात्र 7.65 अरब डॉलर रहा है, जबकि इसी दौरान एफपीआई ने भारत से (इक्विटी व बॉन्ड मिलाकर) कुल 16.59 अरब डॉलर निकाले हैं। इसके बाद चालू वित्त वर्ष 2025-26 के ढाई महीनों में ही वेऔरऔर भी

पश्चिम एशिया संकट का आना-जाना महज एक बहाना है। मोदी सरकार ने 12 सालों में देश की अर्थव्यवस्था को जो जख्म दिए हैं, वे महज मरहम-पट्टी से नहीं भरेंगे। उसकी नीतियों के चलते वित्त वर्ष 2025-26 में देश का भुगतान संतुलन 30.8 अरब डॉलर के घाटे में चला गया। यह घाटा चालू वित्त वर्ष 2026-27 में 50-75 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। सरकार ने इससे बचने के लिए विदेशी निवेशकों को 10 ही नहीं, 15, 30औरऔर भी

देश में जितनी विदेशी मुद्रा आ रही है, उससे कहीं ज्यादा निकल रही है। रिजर्व बैंक के ताज़ा डेटा के मुताबिक इस साल मार्च अंत से 12 जून तक हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 19.483 अरब डॉलर घटकर 671.625 अरब डॉलर रह गया। इसी साल 27 फरवरी को विदेशी मुद्रा भंडार 728.49 अरब डॉलर के रिकॉड स्तर पर पहुंच गया था। उसके बाद से बराबर गिर रहा है। ऐसे में सरकार को देश में विदेशी मुद्रा खींचने केऔरऔर भी

स्पेसएक्स के आईपीओ से पहले एलन मस्क की नेटवर्थ 813 से 970 बिलियन डॉलर थी। आईपीओ आने के बाद उनकी नेटवर्थ 1.1 से 1.3 ट्रिलियन डॉलर हो गई और वे दुनिया के पहले ट्रिलियनर बन गए। 11 जून को आईपीओ में स्पेसएक्स के शेयर 135 डॉलर मूल्य पर जारी हुए। हालांकि इसका अंतर्ऩिहित मूल्य 63 डॉलर ही बताया जाता है। 12 जून को आईपीओ बंद होने तक इसमें लाखों छोटे निवेशकों और हज़ारों बड़े संस्थागत निवेशकों नेऔरऔर भी

भारत की विकासगाथा पर विदेशी निवेशकों का विश्वास पहले ही उठ चुका है। वे सरकार द्वारा पेश जीडीपी के आंकड़ों पर कतई भरोसा नहीं करते। उन्हें अब अगर यकीन हो गया कि भारत में रिजर्व बैंक स्वतंत्र व स्वायत्त नहीं है और केंद्र सरकार के साथ उसका नेक्सस काम कर रहा है तो वे यहां से बचा-खुचा निवेश भी समेटकर ले जा सकते हैं। भुगतान संतुलन देश में कितना धन आया और कितना बाहर गया, इसका अंतरऔरऔर भी

भारत सरकार किसी आपात स्थिति में रिजर्व बैंक से सरप्लस मांगे तो बात समझ में आती है। लेकिन जिस तरह सरकार बनाने के अगले महीने से ही नरेंद्र मोदी रिजर्व बैंक का 99.99% सरप्लस 12 साल से बराबर सोख रहे हैं, उससे लगता है कि सरकार बनाने के पहले से देश के मौद्रिक खजाने पर उनकी नज़र लगी हुई थी। बैंक एम्पलाइज़ फेडरेशन ऑफ इंडिया (बेफी) के अध्यक्ष एस.एस. अनिल का कहना है कि रिजर्व बैंक कीऔरऔर भी

अगर आपको लगता है कि रुपए के कमज़ोर होने और ब्याज दर बढ़ने से रिजर्व बैंक और सरकार की सेहत पर बुरा असर पड़ता है तो आप बहुत बड़ी गफलत में हैं। दरअसल, इनसे रिजर्व बैंक का मुनाफा जमकर बढ़ता है, जिसका 99.99% हिस्सा केंद्र सरकार को मिल जाता है। रिजर्व बैंक ने बीते वित्त वर्ष 2025-26 में ब्याज से ही ₹2,25,419 करोड़ कमाए हैं। वहीं, रुपए को ज्यादा गिरने से रोकने के लिए रिजर्व बैंक बाज़ारऔरऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक पहले भी कमाता था और अब भी कमाता है। वो अपना सारा खर्च खुद उठाता है। लेकिन मई 2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार की वक्री दृष्टि उसके खजाने पर पड़ गई। तभी से वो रिजर्व बैंक का 99.99% लाभ सफाचट करती रही है। लेकिन उसकी धूर्तता को बड़ी चालाकी से ढंक लिया है। पहले रिजर्व बैंक अपनी सालाना रिपोर्ट में सकल आय के साथ आंतरिक रिजर्व में डाला गया कंटेन्जेंसी फंडऔरऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक किसी से एक धेला भी नहीं लेता। फिर वो कैसे इतना कमा लेता है कि केंद्र सरकार को साल भर में ₹2,86,588 करोड़ का लाभांश दे देता है। गौरतलब है कि 2003-04 से 2013-14 तक उसने यूपीए सरकार को दस साल में कुल ₹78,829 करोड़ लाभांश दिया था, जबकि 2014-15 से 2025-26 तक मोदी सरकार के 11 साल के कार्यकाल में वो अब तक केंद्र सरकार को ₹14,28,444 करोड़ का लाभांश दे चुका है।औरऔर भी