भारत की विकासगाथा पर विदेशी निवेशकों का विश्वास पहले ही उठ चुका है। वे सरकार द्वारा पेश जीडीपी के आंकड़ों पर कतई भरोसा नहीं करते। उन्हें अब अगर यकीन हो गया कि भारत में रिजर्व बैंक स्वतंत्र व स्वायत्त नहीं है और केंद्र सरकार के साथ उसका नेक्सस काम कर रहा है तो वे यहां से बचा-खुचा निवेश भी समेटकर ले जा सकते हैं। भुगतान संतुलन देश में कितना धन आया और कितना बाहर गया, इसका अंतर होता है। भारत चूंकि आयात अधिक और निर्यात कम कर करता है, इसलिए इसका चालू खाता हमेशा घाटे में रहता है। 2023-24 तक चूंकि विदेशी निवेश और अनिवासी भारतीयों के भेजे धन से पूंजी खाता भरा हुआ था तो भुगतान संतुलन 63.7 अरब डॉलर सरप्लस में था। लेकिन विदेशी निवेशकों के भागने से 2025-26 में यह 30.8 अरब डॉलर के घाटे में चला गया जो पिछले साल 2024-25 के घाटे 5 अरब डॉलर के छह गुने से ज्यादा है। विदेशी निवेशकों का भरोसा टूटने से रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा जुटाने में भारी दिक्कत होगी। साथ ही सरकार बेहतर आर्थिक हालात में भी उसका सारा अधिशेष खींचती रही तो देश का राजकोषीय संतुलन बिगड़ सकता है। वैसे भी देश में केंद्र व राज्यों का सम्मिलित ऋण जीडीपी का 85% हो चुका है। यह दक्षिण एशिया के औसत 78.3% और दक्षिण-पूर्व एशिया के औसत 67.9% से काफी ज्यादा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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