भारत सरकार किसी आपात स्थिति में रिजर्व बैंक से सरप्लस मांगे तो बात समझ में आती है। लेकिन जिस तरह सरकार बनाने के अगले महीने से ही नरेंद्र मोदी रिजर्व बैंक का 99.99% सरप्लस 12 साल से बराबर सोख रहे हैं, उससे लगता है कि सरकार बनाने के पहले से देश के मौद्रिक खजाने पर उनकी नज़र लगी हुई थी। बैंक एम्पलाइज़ फेडरेशन ऑफ इंडिया (बेफी) के अध्यक्ष एस.एस. अनिल का कहना है कि रिजर्व बैंक की आरक्षित निधि पर केंद्र सरकार की बढ़ती निर्भरता देश के अहम वित्तीय कवच को कमज़ोर करती है। केंद्र को साफ-साफ बताना चाहिए कि वो रिजर्व बैंक का सरप्लस कहां और कैसे इस्तेमाल कर रही है। विशेषज्ञ भी कहते हैं कि रिजर्व बैंक के फंड पर निर्भरता सरकार की राजकोषीय मजबूती के लिए शुभ नहीं है। भविष्य में रिजर्व बैंक रुपए को पूरी तरह फ्लोट कर बाज़ार शक्तियों के हवाले कर देगा तो विदेशी मुद्रा बाज़ार में डॉलर बेचने से होनेवाली उसकी आय जीरो हो जाएगी। वित्त वर्ष 2025-26 में रिजर्व बैंक ने सिस्टम में करीब ₹10 लाख करोड़ मुक्त किए। इससे उसकी बैलेंस शीट 20.6% बढ़ गई तो रिस्क बफर भी बढ़ गया। ऐसे में केंद्र का उससे रिकॉर्ड लाभांश झटकना विदेशी निवेशकों को भी गलत सिग्नल देता है क्योंकि उन्हें लगेगा कि भारत में मौद्रिक संस्था और केंद्र सरकार के बीच कोई नापाक गठबंधन है। अब गुरुवार क दशा-दिशा…
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