कंपनियों के सामने चुनौती होती है साल दर साल ही नहीं, हर तिमाही लगातार बढ़ते रहने की। कभी 15 तो कभी 20 फीसदी या इससे भी ज्यादा तो और भी अच्छा। किसी तिमाही झटका लगा तो हम-आप मुंह बनाने लगते हैं कि कैसी कंपनी है जो बढ़ती नहीं। निरंतर विकास की इसी जरूरत को पूरा करने के लिए वित्तीय बाजार, खासकर शेयर बाजार अस्तित्व में आया। लेकिन धीरे-धीरे यह लोगों की बचत को खींचने का नहीं, लूटनेऔरऔर भी

शेयरों के भाव किस हद तक ग्लोबल और किस हद तक लोकल कारकों से प्रभावित होते है, इसका तो ठीकठाक कोई पैमाना नहीं है, लेकिन इतना तय है कि आज के जमाने में कंपनियों के धंधे पर दोनों कारकों का भरपूर असर पड़ता है। इसीलिए शायद अंग्रेजी के इन दोनों शब्दों को मिलाकर नया शब्द ‘ग्लोकल’ चला दिया गया है। ये ग्लोकल असर कैसे कंपनी को कस लेते हैं, इसका एक उदाहरण है भारत की सबसे बड़ीऔरऔर भी

शेयर बाजार ही वह ठौर है जहां पहुंचाकर अपनी बचत को हम मुद्रास्फीति के क्षयकारी असर से बचा सकते हैं। चूंकि भारत सरकार की तरफ से सरकारी दामादों को छोड़कर किसी भी भारतीय को सामाजिक सुरक्षा नहीं मिली है, इसलिए हारी-बीमारी से लेकर बच्चो की पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याज व अपने रिटायरमेंट तक के लिए हमें खुद ही बचाना पड़ता है। लेकिन सरकार शायद लंबे समय तक सामाजिक सुरक्षा दे भी नहीं सकती। यूरोप में तो थी व्यक्ति कोऔरऔर भी

बहुत सारी कंपनियां बहुत सारी वजहों से इल्लिक्विड हो जाती हैं। लेकिन बी ग्रुप की किसी अच्छी-खासी कंपनी में अगर बिना किसी वजह के दिन भर में केवल एक शेयर की खरीद-फरोख्त हो तो हमारे पूंजी बाजार नियामक, सेबी को जरूर सोचना चाहिए कि बाजार में ऐसा सन्नाटा क्यों है भाई? यहां बुरे का बोलबाला, अच्छे का मुंह काला क्यों है? दक्षिण भारत की कंपनी श्रीराम सिटी यूनियन फाइनेंस के साथ बीते हफ्ते यही हुआ। शुक्रवार, 2औरऔर भी

अक्सर बहुत सारी बातें सिद्धांत में बड़ी सतरंगी होती हैं, लेकिन व्यवहार में बड़ी बदरंग होती हैं। सिद्धांततः माना जाता है कि शेयरधारक अपने हिस्सेदारी की हद तक कंपनी का मालिक होता है। लेकिन सच्चाई में ऐसा बस मन का धन है। सौ-दो सौ या हजार-दो हजार शेयर रखनेवालों की तो बात छोड़ दीजिए, 10-15 फीसदी हिस्सेदारी रखनेवाले संस्थागत निवेशकों (एफआईआई, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां) तक का कोई योगदान कंपनी के फैसलों में नहीं होता है। पब्लिकऔरऔर भी

अच्छे लोग, बुरे लोग। अच्छी कंपनियां, बुरी कंपनियां। अब अगर आप निवेश के लिए किसी ईश्वर भुवन होटल्स जैसी गुमनाम कंपनी को चुनते हैं तो सचमुच ईश्वर ही आपका मालिक है। कंपनी आपकी बचत लेकर गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाएगी। लेकिन क्या करें! हम तो फास्टफूड के आदी हो चुके हैं। सब कुछ पका-पकाया चाहिए। किसी ने बताया, टिप दी, खरीद लिया। डूब गए तो शेयर बाजार को लाख-लाख गालियां देने लगे।औरऔर भी

मैकनल्ली भारत इंजीनियरिंग कंपनी इस साल अपनी स्वर्ण जयंती बना रही है। कोलकाता के विलियमसन मैगर समूह की कंपनी है। 1961 से कार्यरत कंपनी का तंत्र बाहर तक फैला है। फ्रांस, रूस, पोलैंड, जर्मनी, चीन व यूक्रेन तक की कंपनियों से तकनीकी सहयोग समझौता है। दो साल पहले 2009 में इसने जर्मन कंपनी केएचडी हमबोल्ट वेडाग की कोयला व खनन टेक्नोलॉजी डिवीजन खरीद ली। हंगरी में भी इसकी सब्सडियरी है। लेकिन सारे तामझाम के बावजूद है यहऔरऔर भी

बाजार के बारे में क्या कहा जाए! यहां कोई न्यूनतम स्तर भी न्यूनतम स्तर नहीं होता। जैसे, नव भारत वेंचर्स ने पिछले साल 29 नवंबर 2010 को 295.10 रुपए पर तलहटी बनाकर 302 रुपए पर बंद हुआ तो उसका तब का पी/ई अनुपात 5.33 था और शेयर की बुक वैल्यू थी 234.06 रुपए। ऐसे में इसमें निवेश की सलाह तो बनती ही थी। लेकिन यह शेयर 30 अगस्त 2011 को 158 रुपए के नए न्यूनतम स्तर पहुंचऔरऔर भी

सभी आवश्यक सूचनाओं तक सबकी पहुंच। किसी भी बाजार के कुशलता से काम करने की यह अनिवार्य शर्त है। ध्यान दें, सूचनाओं की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं, उनकी पहुंच जरूरी है। जो फेंच न जानता हो, उसे फ्रेंच में जानकारी देना महज एक अनुष्ठान भर पूरा करना है। लेकिन अपने यहां, खासतौर पर शेयर बाजार में यही हो रहा है। एक तो सारी सूचनाएं अंग्रेजी में, दूसरे ऐसा घालमेल कि आम निवेशकों को कुछ पल्ले ही नऔरऔर भी

शेयर बाजार किसी इलाहाबाद का मीरगंज, दिल्ली का श्रद्धानंद मार्ग या मुंबई का कमाठीपुरा नहीं है कि गए और चोंच मारकर आ गए। यहां रिश्ते चंद रातों के नहीं, सालों-साल के बनते हैं। यहां के रिश्ते एकतरफा भी नहीं होते। दोनों पक्षों को भरपूर मिलता है। न मिले तो सब कुछ टूट जाता है, सारा औद्योगिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। यह करीब पांच सौ साल पहले उत्तरी यूरोप से शुरू हुआ वो जरिया है जिससे व्यक्तियोंऔरऔर भी