वित्त सचिव से रिजर्व बैंक के गवर्नर बने शक्तिकांत दास ने छह साल तक मोदी सरकार के दास की तरह काम किया। 12 दिसंबर 2018 को उनके गवर्नर बनने के बाद से 31 मार्च 20124 तक सरकार रिजर्व बैंक के खजाने से ₹6.61 लाख करोड़ साफ कर चुकी है। दास से पहले गवर्नर रहे उर्जित पटेल ने जब इसका विरोध किया था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें खजाने पर कुंडली मारकर बैठा नाग तक कह दियाऔरऔर भी

सरकार ब्याज दरें क्यों घटवाना चाहती है? कहने और बोलने को इसका मसकद यह है कि ब्याज दरें कम होंगी तो निजी क्षेत्र पूंजी निवेश करने को प्रेरित होगा। लेकिन क्या अर्थव्यवस्था में मांग पैदा किए बगैर निजी क्षेत्र को पूंजी निवेश के लिए उकसाया जा सकता है? उसके पास अभी जो उत्पादन क्षमता है, उसका पूरा इस्तेमाल तो वो अभी मांग न होने की वजह से कर नहीं पा रहा। ऐसे में ब्याज दरें कितनी भीऔरऔर भी

सितंबर 2024 की तिमाही में देश के जीडीपी की विकास दर घटकर 5.4% रह जाने से सरकार के पसीने छूट रहे हैं। उसे डर है कि दस सालों से अर्थव्यवस्था के इर्द-गिर्द बुना जा रहा तिलिस्म कभी भी भरभराकर टूट सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तो बोलती बंद है। लेकिन दो प्रमुख आर्थिक मंत्रालयों से संबद्ध वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सारे घोड़े खोल दिए हैं। अपनी अकर्मण्यता पर नज़र डालनेऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था की जो स्थिति अभी है और अगले एकाध साल में जो हो सकती है, यह सारी जानकारी शेयर बाज़ार हर समय जज्ब करके चलता है। इसलिए किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए कि वह अर्थव्यवस्था को जानकर शेयर बाज़ार का सफल निवेशक बन सकता है। हां, इसका उल्टा ज़रूर सही है कि शेयर बाजार प्रचार के शोर को भेदकर अर्थव्यवस्था का सच्चा हाल बयां कर देता है। जैसे, इस समय निफ्टी-50 सूचकांक में शामिल चार कंपनियोंऔरऔर भी

जीडीपी की विकास दर घटने को दो अन्य वजहें ज्यादा संगीन है और भारत की विकासगाथा पर कुठाराघात करती हैं। सरकार टैक्स संग्रह बढ़ने को अपनी नीतियों की सफलता बताती है। जैसे, नवंबर में जीएसटी से ₹1,82,269 करोड़ मिले तो उसने खूब वाहवाही लूटी। लेकिन अवाम से ज्यादा टैक्स वसूलना देश के विकास के लिए घातक है। हमारे यहां केंद्र से लेकर राज्य व लोकल टैक्सों को मिला दें तो वे जीडीपी का 19% बनते हैं, जबकिऔरऔर भी