मोदी सरकार झूठ के तपते तवे पर कैसे राजनीति की रोटियां सेंक रही है, इसका प्रमाण है पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस)। एक तो उसने 2017-18 के सर्वे की रिपोर्ट अभी तक छिपा रखी है क्योंकि उसमें प्रति व्यक्ति व्यय 2011-12 की तुलना में घट गया था। दूसरे, उसने छह साल बाद अगस्त 2023 से जुलाई 2024 तक 2023-24 के पारिवारिक उपभोग व्यय का नया सर्वे किया। इस बीच दौरान कोरोना महामारी के बीच देश भर मेंऔरऔर भी

सरकार देश के जीडीपी में आम लोगों की खपत का योगदान सायास कम करने में लगी है। वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान जीडीपी में निजी अंतिम खपत व्यय (पीएफसीई) का हिस्सा 61.3% हुआ करता था, जबकि निर्यात का हिस्सा 18.7% और आयात का हिस्सा 19.1% हुआ करता था। वित्त वर्ष 2022-23 में निजी खपत का हिस्सा घटकर 60.6% और निर्यात का हिस्सा बढ़कर 22.8% व आयात का 26.4% हो गया। वित्त वर्ष 2025-26 तक जीडीपी में निजीऔरऔर भी

भारत में खपत की असलियत को क्यों छिपाने में लगी है मोदी सरकार? यह अभी नहीं, बल्कि 2014 से 2019 तक के अपने पहले कार्यकाल से ही कर रही है। यह मोदी सरकार की नीयत है या फितरत? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके जानेमाने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने खुलासा किया है कि 2011-12 के बाद देश में 2017-18 में रोज़गार के साथ ही घरेलू खपत खर्च का भी सर्वे हुआ था।औरऔर भी

कालिदास परम मूर्ख थे कि जिस डाल पर बैठे थे, उसे ही काट रहे थे। लेकिन मोदी सरकार तो चरम धूर्त है कि जिस विकसित भारत का सपना दिखाकर देश पर राज करते रहना चाहती है, उसी के मूलाधार को खोखला किए जा रही है। भारत से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) दोनों ही भाग रहे हैं क्योंकि सरकार की नीतियां विश्वास करने लायक नहीं हैं और भारत की विकासगाथा का अंत करीबऔरऔर भी

अनिश्चितता से भरा समय है और अनिश्चितता से ही भरा है शेयर बाज़ार। इस अनिश्चितता से जूझने के लिए जिसने रिस्क लिया, उसने या तो कमाया या अनुभव से थोड़ी समझ और हौसला हासिल किया। जिसने रिस्क नहीं लिया तो धारा के साथ बह गया या बहते-बहते कहीं किनारे लग गया। करना क्या है, यह हर किसी को रिस्क लेने की अपनी क्षमता के हिसाब से तय करना है। शेयर बाज़ार का कोई भरोसा नहीं। बड़ों कोऔरऔर भी

मोदी सरकार की जीडीपी चमत्कार गाथा में जितना गहरे उतरते जाइए, आपका माथा उतना ही चकराता जाता है। ऊपर-ऊपर 7.8% या 2.6% की विकास दर और डबल डिफ्लेटर के खेल को किनारे रख दें तो एक नया चौंकानेवाला रहस्य कूदकर सामने आ खड़ा होता है। नई सीराज की गणना में 2022-23 से लेकर 2025-26 तक का जीडीपी पुरानी सीरीज़ से पूरे ₹42.1 लाख करोड़ घटा दिया गया है। मतलब उक्त तीन सालों में पहले बताया गया जीडीपीऔरऔर भी

देश का जीडीपी और उसकी विकास दर भले ही जन-जन से जुड़ी है, लेकिन सरकार ने उसे जन-जन से दूर रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। पहले थोक मुद्रास्फीति को डिफ्लेटर बनाकर चला गया, तब उसमें उद्योग-धंधों और थोक व्यापारियों की स्थिति देखी गई, आमजन पर पड़ रही महंगाई की मार नहीं। डिफ्लेटर 0.8% और 2.2% लिया गया, जबकि रिटेल मुद्रास्फीति  2.4% और 4.9% रही थी। इस साल से जो डबल डिफ्लेटर इस्तेमाल किया जा रहाऔरऔर भी

दुनिया भर में नॉमिनल जीडीपी में किसी झूठ या फ्रॉड की गुंजाइश नहीं क्योंकि वो बाज़ार मूल्यों पर आधारित होता है और बाज़ार मूल्य अमूमन झूठ नहीं बोलते। मई 2014 से पहले भारत में भी ऐसी कोई गुंजाइश नहीं थी। तब औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) जैसे मात्रा पर आधारित सूचकांकों से रीयल जीडीपी की गणना सीधे की जाती थी और फिर उसमें डिफ्लेटर जोड़कर नॉमिनल जीडीपी निकाला जाता था। लेकिन मोदी सरकार ने जनवरी 2015 से जीडीपीऔरऔर भी

देश के आम से लेकर खास लोग और दिहाड़ी मजदूर से लेकर कॉरपोरट तक हम सभी रोजमर्रा के जीवन में जो देखते, समझते, झेलते, भोगते व महसूस करते हैं, वो नॉमिनल जीडीपी और उसकी विकास दर में ही झलकता है। हालांकि दुनिया भर में इसे मुद्रास्फीति-निरपेक्ष बनाने के लिए डिफ्लेटर का इस्तेमाल कर रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर निकाली जाती है। लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर मूलतःऔरऔर भी