रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा सब चंगा सी!
करीब 146 करोड़ आबादी वाले जिस देश में केंद्र व राज्य सरकारों के साथ ही सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों को मिलाकर बमुश्किल ढाई करोड़ लोगों को सामाजिक सुरक्षा मिल रही हो, जिसे देखकर हर युवा इन्हीं नौकरियों की तरफ भागता हो और आरक्षण को लेकर मारा-मारी होती है, वहां केद्रीय श्रम व रोज़गार मंत्री मनसुख मंडाविया का दावा है कि मोदी सरकार ने 94 करोड़ लोगों या 64.3% आबादी को मजबूत सामाजिक सुरक्षा दे रखी है।औरऔर भी
मंडाविया ने झूठ में मोदी को भी दी मात
देश-दुनिया के लिए भारत की 65% युवा आबादी उसकी ऐसेट या आस्ति है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं मानती क्योंकि मान लें तो उसे इसकी ज़िमेमदारी उठानी पड़ेगी, इसे अपना मानकर संभालना पड़ेगा। कोई एक भी युवा रोज़गार में नहीं लगा तो सरकार को इस राष्ट्रीय नुकसान की भरपाई उस खजाने से करनी पड़ेगी जिसे वो इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिट गेन्स टैक्स, सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स व प्रॉपर्टी टैक्स जैसे प्रत्यक्ष और कस्टम, एक्साइज़ व जीएसटी जैसे परोक्षऔरऔर भी
युवा देश की आस्ति, बेरोज़गारी देनदारी!
धूमिल की मशहूर पंक्ति है कि लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है। इसी तरह 12 साल के मोदीराज में भारत की विकासगाथा कहां तक पहुंची है, इसका जवाब सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापनों और जीपीपी के डेटा, भुगतान संतुलन की स्थिति या शेयर बाज़ार की उठापटक में नहीं, बल्कि करोड़ों छात्र-छात्राओं और युवक-युवतियों की घुटन व कुंठा में ढूंढा जाना चाहिए। कभी पेपरलीक तो कभी परीक्षा रद्द। कोईऔरऔर भी
आम व खास के खेल में पिट रहा है देश
भारतीय शेयर बाज़ार में पंजीकृत निवेशकों की संख्या 25 करोड़ के पार जा चुकी है। इनमें से अलग-अलग पैन नंबर वाले निवेशकों की संख्या 13.1 करोड़ के आसपास है। इनमें से कम से कम 12 करोड़ निवेशक आम और 1.1 करोड़ निवेशक खास होने चाहिए। जब आम निवेशक आईपीओ या सीधे बाज़ार से शेयर खरीदते हैं तो सामने से ज्यादातर खास निवेशक बेचते हैं। खास निवेशकों में तमाम विदेशी निवेशक होते हैं जो वेंचर कैपिटल और प्राइवेटऔरऔर भी






