निजी स्वार्थ में डूबा आत्मविभोर व्यक्ति सत्ताशीर्ष पर बैठकर देश-दुनिया का कितना नुकसान कर सकता है, इसे पश्चिम एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया है। प्रधानंमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25-26 फरवरी को जेरूसलम जाकर फर्जी मेटल के चक्कर में ‘फादरलैंड’ कहकर इज़रायल को सिर न चढ़ाया होता तो शायद अमेरिका के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला करने की उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती। इस हमले के बाद ब्रेन्ट कच्चे तेल के दाम 51%, यूरिया व अमोनिया के दाम 68% और ब्यूटेन के दाम 51% बढ़ गए हैं, जबकि इसी दौरान भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 5.16% गिर चुका है। हमारा रुपया इस साल एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करनेवाली मुद्रा है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन खुद कहते हैं कि यह कोई अस्थाई संकट नहीं है जो ईरान-अमेरिका में संधि होने के साथ खत्म हो जाएगा और सब कुछ सामान्य हो जाएगा। उनका कहना है कि 2020 से पहले की स्थितियां अब कभी नहीं लौट सकतीं। भारत का चालू खाता और पूंजी खाता, दोनों दबाव में है। संकट कितना भीषण है कि मोदी को खुद सोना न खरीदने, विदेशी यात्रा पर न जाने और खाने का तेल तक कम इस्तेमाल करने जैसी अनर्गल अपील करनी पड़ी है, जबकि दुनिया के किसी अन्य देश ने ऐसा नहीं किया है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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