इधर मोदी का राजनीतिक विजय-रथ आसमान का रुख किए हुए है, उधर भारतीय रुपया रसातल में डूबता बराबर नई-नई तलहटी पकड़ता जा रहा है। आज एक डॉलर 95.91 रुपए और यूरो 112.27 रुपए पर जा पहुंचा। कमाल की बात यह है कि जनवरी 2025 से फरवरी 2026 तक जब रुपया खाक बनता जा रहा था, तब सरकारी और निजी अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि भारत ‘गोल्डीलॉक्स’ अवस्था से गुजर रहा है, जहां आगे सब अच्छा ही अच्छा होगा। फिर भी रुपया तब डॉलर के मुकाबले 12% से ज्यादा गिर गया, जब डॉलर खुद दूसरी मुद्राओं के सापेक्ष गिर रहा था। इसकी वजह देश से सिर्फ पूंजी का पलायन ही नहीं है। एक प्रमुख वजह यह कि अमेरिका के साथ भारत के बिगड़ते व्यापारिक रिश्तों ने माहौल खराब दिया। दूसरी वजह कि देश में एआई में उल्लेखनीय धमक वाली कोई कंपनी नहीं है तो वैश्विक निवेशक ऐसी कंपनियों की तलाश में बाहर भागने लगे। तीसरे, देश में उपभोक्ता मांग और बिजनेस का सही माहौल नहीं है तो हमारी अपनी कंपनियां देश के बजाय विदेश में निवेश कर रही हैं। इसके ऊपर ईरान पर अमेरिका-इज़रायल के हमले ने पश्चिम एशिया में जो अशांति पैदा की, उसने कोढ़ में खाज का काम किया। संकट अब विकराल होने लगा। महज दो महीने में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 38 अरब डॉलर घटकर 690.69 अरब डॉलर रह गया है। अब बुधवार की बुद्धि…
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