ज़मीन वर्तमान की, जोखिम भविष्य का!
निवेश हमेशा भविष्य के लिए किया जाता है, अभी के लिए नहीं। यह भविष्य दो-चार साल से लेकर 10-20 साल भी हो सकता है। लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह कोई अभी से जान या बता नहीं सकता। ऐसे में पत्र-पत्रिकाएं और ब्रोकर, सब-ब्रोकर और एजेंट टाइप लोग ऐसी कंपनियों के शेयर खरीदने को कहते हैं जो पहले से काफी बढ़े हुए हैं। लोगबाग भी लालच में इनके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन सवाल उठता हैऔरऔर भी
डमरू बजा भारत को कर दिया कंगाल
भारत के पास प्रतिभा है, मांग है और व्यापक डिजिटल तंत्र है। लेकिन भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में इन मजबूत पहलुओं को समाहित करने की सामर्थ्य तो छोड़िए, नीयत तक नहीं है। वे तो भारत छोड़ बाहर निवेश करते जा रहे हैं। यही वजह है कि एफडीआई के रूप में देश में जितनी पूंजी आ रही है, कमोबेश उतनी ही भारतीय पूंजी बाहर निकल जा रही है तो शुद्ध एफडीआई की स्थिति दयनीय है। अनिवासी भारतीयों तक नेऔरऔर भी
देश के पिटने की वजह बाहर नहीं, अंदर
सरकार और उसके अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि हमारे रुपए और शेयर बाज़ार की हालत आंतरिक नहीं, बाहरी वजहों से खराब हुई है। उसके मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन अंकटाड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते है कि 2022 के बाद ही दुनिया में विदेशी निवेश उभरते देशों से निकलकर विकसित देशों की तरफ जा रहा है। इससे भारत समेत तमाम उभरते देशों की मुद्रा और शेयर बाज़ार कमज़ोर हुए हैं। लेकिन ब्राज़ील भी तोऔरऔर भी
रुपए व शेयर बाज़ार ने खोली सारी पोल
मोदी सरकार ने भारत की विकासगाथा को खिलने से पहले ही कैसे कुचलकर मसल दिया है, उसके कुछ पुख्ता प्रमाण। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला कहते हैं कि 2013 में भारत को दुनिया की पांच फ्रेज़ाइल या भंगुर अर्थव्यवस्थाओं में गिना गया था। बाकी देश थे – इंडोनेशिया, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किए। लेकिन आज दुनिया में केवल दो भंगुर अर्थव्यवस्थाएं बची हैं। एक है भारत औरऔरऔर भी






