शेयर बाज़ार के निवेशकों का साबका बार-बार ‘वैल्यू’ से पड़ता है। वॉरेन बफेट का मशहूर वाक्य है कि ‘प्राइस’ वो है जो आप देते हो और ‘वैल्यू’ वो है जो आप पाते हो। अंग्रेज़ी में पारंगत लोग भले ही इसका अर्थ और मर्म समझ लें। लेकिन हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएं बोलने-समझने वाले लोगों को इसमें काफी दिक्कत होती है। प्राइस का अनुवाद कीमत, दाम या भाव हो सकता है और वैल्यू को हम मूल्य कह सकतेऔरऔर भी

पिछले 10-12 साल से देश में गुजरात के आदर्श मॉडल का हल्ला चल रहा है। लेकिन पिछले माह निकारागुआ के रास्ते अमेरिका भागने की जुगत में लगे 303 नौजवानों में से सबसे ज्यादा 65 युवा गुजरात के थे। इन्हीं में मेहसाणा के एक युवक का कहना था, “यहां तो केवल उन्हीं को सरकारी नौकरी मिलती है जो पैसा खिलाते हैं या जिनकी तगड़ी पहुंच है। प्राइवेट में कायदे का पैसा नहीं मिलता। इसलिए भारत में रहकर हमेशाऔरऔर भी

देश का नौजवान भाग रहा है। देश में काम नहीं तो विदेश का रुख कर रहा है। पिछले ही महीने भारत के 303 नौजवान निकारागुआ के रास्ते अमेरिका पहुंचने के फेर में फांस में धर लिए गए। भारत से संयुक्त अरब अमीरात, दुबई और फिर चार्टर्ड प्लेन से फ्रांस के वात्री एयरपोर्ट के पहुंचे तो वहां अधिकारियों को संदेह हुआ और बहुत फजीहत के बाद उन्हें लाकर मुंबई एयरपोर्ट पटक दिया गया। इस घटना पर भी वैसीऔरऔर भी

यह सरकार नॉमिनल और रीयल यानी, सतह पर जो दिख रहा है और जो असल में है, उस पर जमकर खेल रही है। चालू वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में अनुमान था कि हमारा जीडीपी नॉमिनल स्तर या ऊपर-ऊपर 10.5% बढ़ेगा और 4% मुद्रास्फीति या डिफ्लेटर को घटाने के बाद जीडीपी की रीयल या असल विकास दर 6.5% रहेगी। अब हुआ यह है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) ने पूरे वित्त वर्ष का जो पहला अग्रिम अनुमानऔरऔर भी

सरकारी योजनाओं के प्रचार में चुनाव का तड़का लग जाए तो रंग में भंग नही पड़ती, बल्कि रंग पर भंग और ज्यादा चढ़ जाती है। देश फिलहाल आगामी लोकसभा चुनावों के सुपर-मोड में जा चुका है। राम मंदिर के अक्षत घर-घर तक पहुंचा दिए गए हैं। 22 जनवरी को अयोध्या में राम की नई मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ जो गुबार उठेगा, वो सारे उत्तर भारत को छा लेगा। इसके नीचे धरातल पर दिन अखबारों में हेडलाइंसऔरऔर भी

सर्दी उतर रही है। लेकिन कोहासा व धुंधलका बढ़ता ही जा रहा है। कहीं कुछ साफ नहीं दिख रहा। जिन बैंकिंग व आईटी कंपनियों में उछाल की बदौलत सेंसेक्स और निफ्टी नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए, इन सूचकाकों में शामिल कंपनियों की सालाना रिपोर्ट ही बताती है कि 83% यौन उत्पीड़न के मामले उन्हीं के खिलाफ हैं। क्या शेयर बाज़ार का निवेशक व ट्रेडर इतना संवेदनहीन है कि मुनाफे के चक्कर में ऐसे अनैतिक आचरण कोऔरऔर भी

इस साल शेयर बाज़ार कभी क्रैश हो गया तो? ऐसा नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। बढ़ता रहे तो बहुत अच्छा। लेकिन धसक गया तो? हमें इसकी तैयारी रखनी ही चाहिए। आंख-कान और दिमाग हमेशा खुला रखना होगा। साथ ही अभी तक के निवेश पर हासिल रिटर्न को कैसे बचा लिया जाए, इसका भी इंतज़ाम कर लेना पड़ेगा। हम जानते हैं कि बाज़ार टूटने पर सबसे ज्यादा माइक्रो-कैप, स्मॉल-कैप और मिड-कैप कंपनियों के शेयर टूटते हैं, जबकिऔरऔर भी

हमारे विशाल देश भारत में रोज़गार की समस्या विकट सच्चाई है। इसे किसी भी जुमले या हवाबाज़ी से नहीं हल किया जा सकता। हमारी आबादी का मीडियम या मध्यमान 28 साल का है। हमें यह भी समझना होगा कि लोगबाग सरकार से नौकरियां नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां चाहते हैं जिनसे रोज़ी-रोज़गार के मौके बढ़ें। मुठ्ठी भर ज्यादा पढ़े-लिखे लोग ही सरकारी नौकरियों के चक्कर में पड़ते हैं और आरक्षण के लिए मारा-मारी करते हैं। बाकी ज्यादातर लोगऔरऔर भी

गजब स्थिति है। सब कुछ ऐड-हॉक है, तदर्थ है। लेकिन जनता को सपना बेचे रहे हैं 1947 में देश को विकसित बनाने का। चुनाव हैं तात्कालिक। भाजपा कार्यकर्ताओं से लेकर अफसरों व कर्मचारियों को उज्ज्वला, आयुष्मान व मुफ्त राशन जैसी सरकारी योजनाओं के प्रचार में झोंक दिया गया है। लेकिन नाम दिया गया है विकसित भारत संकल्प यात्रा। देश में ज़रूरत है कि निजी उद्योगों को शामिल करके रोज़गार की समस्या को युद्धस्तर पर हल किया जाए।औरऔर भी

जिस मानव संसाधन या डेमोग्राफिक डिविडेंड पर हमारी अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार है, वही सबसे ज्यादा उपेक्षित है। देश में 1968 की शिक्षा नीति में तय हुआ था कि केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर हर साल जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करेंगी। 1986 की नीति में भी यही लक्ष्य दोहराया गया। अभी सबसे नई बनी 2020 की शिक्षा नीति में भी वही लक्ष्य दोहराया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि यह लक्ष्य आज तक कभीऔरऔर भी