बराबरी के स्तर पर लड़ाई हो तो रिंग में हो रही बॉक्सिंग की तरह हार या जीत महज एक सहज व स्वाभाविक खेल है। लेकिन हमारे शेयर बाज़ार में बराबरी का यह स्तर देशी-विदेशी संस्थाओं और प्रोफेशनल ट्रेडरों के दायरे से बाहर निकलते ही भेड़ियाधसान बन जाता है। यहां रिटेल ट्रेडर सबसे असहाय जीव है। बाज़ार के इर्दगिर्द हर शाख पर इतने शिकारी बैठे हैं जो उसकी हड्डी तो छोड़िए, चमड़ी तक निचोड़ डालते हैं। लालच कोऔरऔर भी

हर बड़ी कंपनी अच्छी नहीं होती और हर छोटी कंपनी खराब नहीं होती। यह अलग बात है कि एफआईआई जैसे बड़े निवेशकों के लिए छोटी कंपनियां उस ‘मछली जल की रानी है’ की तरह होती हैं जिन्हें ‘हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी।’ असल में इन कंपनियों की इक्विटी बेहद कम होती है जबकि एफआईआई की न्यूनतम खरीद भी अपेक्षाकृत बहुत बड़ी होती है। उनके घुसते ही ऐसी कंपनियों के शेयर चढ़ जाते और निकलतेऔरऔर भी

ट्रेडिंग के लिए कौन-से स्टॉक्स चुनें, इसका फैसला हमेशा मुख्य सूचकांकों में से किया जाना चाहिए। निफ्टी-50 नहीं तो नेक्स्ट-50 पर नज़र डालें। इसी तरह मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों से होते हुए अलग-अलग उद्योग व सेवा क्षेत्र के सूचकांकों तक उतर जाएं। इनमें से भी सही स्टॉक्स न मिलें तो निफ्टी-50 एल्फा तक चले जाएं। हालांकि, इस वक्त सबसे बड़ी दिक्कत है बाज़ार में चल रही भारी सट्टेबाज़ी, जिसके केंद्र में हैं रिटेल ट्रेडर। बीते डेढ़-दो सालऔरऔर भी

लम्बे निवेश का फंडा एकदम अलग है और ट्रेडिंग का एकदम अलग। ट्रेडिंग में कंपनी के ईपीएस, बुक वैल्यू और स्टॉक के पी/ई व पी/बी अनुपात का कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां तो बस इतना देखना पड़ता है कि धन का प्रवाह किन स्टॉक्स का पीछा कर रहा है और किनसे दूर भाग रहा है। खासकर, एफआईआई का रुख क्या है? यह भी कि इस दौरान एचएनआई और प्रोफेशनल ट्रेडरों का क्या व्यवहार है? डीआईआई तो हमेशाऔरऔर भी

अमूमन इंट्रा-डे ट्रेडर के लिए वही स्टॉक्स माफिक होते हैं जो 52 हफ्तों के शिखर से 2-4% नीचे हों। ऐसे स्टॉक्स निफ्टी-50 से लेकर नेक्स्ट-50 और दूसरे सूचकांकों में साफ देखा सकता है। इन्हें देखकर ट्रेडर को अपना-अपना नियम-कायदा या अल्गोरिदम लगाना पड़ता है। लेकिन चूंकि स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेडर कम से कम 5-10% कमाने के लिए ट्रेड करते हैं तो 52 हफ्ते के शिखर से 2-4% नीचे चल रहे स्टॉक्स उन्हें नहीं जमते। उन्हें तोऔरऔर भी

छठ पर्व में भले ही डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जाता हो। लेकिन शेयर बाजार में हमेशा उगजे सूरज को ही ट्रेडिंग के लिए चुना जाता है। शॉर्टसेल भा उन्हीं स्टॉक्स में की जाती है जिनके सितारे कुछ समय पहले तक बुलंद थे। कम से कम प्रोफेशनल ट्रेडरों का तो यही रवैया रहता है। बाज़ार में कई सॉफ्टवेयर हैं जो सारे स्टॉक्स में से छांटकर बता देते हैं कि कौन-से स्टॉक्स में साल से लेकर महीने औरऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने अंततः वह स्कीम शुरू ही कर दी जिसके जरिए आम लोग सीधे-सीधे सरकारी बांडों में निवेश कर सकते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि जब उन्हें पीपीएफ में 7.1%, किसान विकास पत्र में 6.9%, एनएससी में 6.8% और सुकन्या समृद्धि योजना में 7.6% सुरक्षित सालाना ब्याज मिल रहा है तो वे 6.3% पाने के लिए सरकारी बांडों का रुख क्यों करेंगे? कुछ जानकार बताते हैं कि केंद्र सरकार को इस साल 12.5 लाख करोड़औरऔर भी

शेयर बाज़ार के ट्रेडर को हमेशा होश रहना चाहिए कि उसे दिमाग का योद्धा बनना है। इसमें अगर वह महारथी बन गया तो न केवल उसकी पूंजी हमेशा सलामत रहेगी, बल्कि नियमित रूप से बढ़ती भी रहेगी। हम अपना युद्ध अपनी सोच के दम पर लड़ते हैं, न कि तेज़ इंटरनेट कनेक्शन या शानदार ट्रेडिंग टर्मिनल के दम पर। यह भी याद रहे कि यहां हर किसी के अपने स्वार्थ हैं और हर कोई हर दूसरे काऔरऔर भी

कुछ लोग कमोडिटी या जिंस बाज़ार को शेयर बाज़ार से जोड़कर देखते हैं। वे भूल जाते हैं कि कमोडिटी बाज़ार में भाव सीधे-सीधे मांग व आपूर्ति के संतुलन से तय होते हैं और इसमें मांग व आपूर्ति की कोई सीमा नहीं होती। वे असीमित हद तक जा सकती हैं। लेकिन शेयर बाज़ार में हर कंपनी के शेयरों की चुकता पूंजी सीमित है। उसकी आपूर्ति नहीं बढ़ाई जा सकती है। मगर, मीडिया में माहौल बनाकर उसके शेयर कीऔरऔर भी

कुछ लोगों का दिमाग बड़े रैखिक तरीके से चलता है। वे हिसाब लगाते हैं कि कोई शेयर या सूचकांक महीने में 10% बढ़ा तो छह महीने में 60% और दस महीने में 100% बढ़ जाएगा। लेकिन यह सांख्यिकी तक का भ्रमजाल है और शेयर बाज़ार में तो ऐसा हिसाब-किताब चलता ही नहीं। अब तक ऐसा हुआ है तो आगे उसी दिशा में ऐसा-ऐसा होगा, कोई ट्रेडर अगर ऐसा सोचकर चले तो समझ लीजिए कि उसका विनाशकाल शुरूऔरऔर भी