हम शेयर बाज़ार में लिस्टेड कंपनी के शेयर इसीलिए खरीदते हैं ताकि कुछ साल बाद उन्हें बेचकर मुनाफा कमा सकें, अपनी ज़रूरत पूरी कर सकें। इसके लिए शेयर को कम से कम भाव पर खरीदना ज़रूरी है। मान लें कि झोंक में आकर या किसी के कहने पर हमने किसी कंपनी का शेयर बढ़े भाव पर खरीद लिये तो वह आखिर कितना बढ़ेगा! अगर उसने बचत खाते या एफडी के बराबर रिटर्न दिया तो क्या फायदा? शेयरोंऔरऔर भी

दावा है कि भारत सरकार का ऋण स्तर दुनिया के तमाम देशों की तुलना में बेहद कम है। वित्त मंत्रालय का कहना है कि सरकार का कुल ऋण जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 86.9% है, जबकि अमेरिका का 125.6%, फ्रांस का 112.6%, कनाडा का 101.8%, ब्राज़ील का 91.9% और ब्रिटेन का 87.8% है। हालांकि इस साल के बजट दस्तावेज के मुताबिक मार्च 2022 तक भारत सरकार पर कुल देशी-विदेशी ऋण 135.88 लाख करोड़ रुपए का था, जबकिऔरऔर भी

भारत सरकार का ऋण यकीनन इतना ज्यादा नहीं बढ़ा है कि श्रीलंका जैसी स्थिति हो जाए। देश पर चढ़े कुल विदेशी ऋण में से 40.3% गैर-वित्तीय निगमों, 25.6% जमा लेनेवाले निगमों, 21.1% केंद्र सरकार, 8.6% अन्य वित्तीय निगमों और बाकी 4.4% सीधा अंतर-कंपनी निवेश है। यह भी सच है कि विदेशी ऋण का हिस्सा कुल सरकारी ऋण में घटता गया है। यह वित्त वर्ष 2013-14 में 6.4% हुआ करता है जो 2021-22 तक 4.7% रह गया। मतलब,औरऔर भी

इकनॉमिक्स टाइम्स की खबर के बाद सरकार परेशान हो गई। उसने इस खबर को ही अफवाह बताते हुए कहा कि यह बात एकदम निराधार है कि केंद्र सरकार विदेशी ऋण के बोझ के नीचे दबी है। उसने सफाई दी कि देश पर चढ़े कुल 620.7 अरब डॉलर के ऋण में से सरकार का ऋण केवल 130.8 अरब डॉलर या 21.07% है। यह भी सच है कि देश को अगले नौ महीनों में 267.7 अरब डॉलर का ऋणऔरऔर भी

रिजर्व बैंक के अनुसार भारत के ऊपर चढ़ा विदेशी ऋण मार्च 2022 के अंत तक 620.70 अरब डॉलर था। यह साल भर में 47.10 अरब डॉलर बढ़ा है। वहीं, देश का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले दस महीनों में 70 अरब डॉलर घटकर 572.71 अरब डॉलर रह गया है, विदेशी ऋण से 48 अरब डॉलर कम। कुल विदेशी ऋण में से 499 अरब डॉलर लम्बी अवधि का है, जबकि छोटी अवधि या एक साल तक का ऋण 121औरऔर भी

सारा लेनदेन रुपए में। सारी ट्रेडिंग रुपए में। उस शेयर बाज़ार में जहां डॉलर को रुपए में बदलकर निवेश व ट्रेडिंग करनेवाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का पलड़ा सबसे ज्यादा भारी है। ऐसी स्थिति में रुपया अगर डॉलर के मुकाबले गिरता जा रहा है तो इसका कारण व निदान समझना ज़रूरी हो जाता है। नहीं तो हाल उस पादरी जैसा हो जाएगा जो नदी के मंझधार में डूबती बड़ी नांव में ईश्वर का शुक्रिया इस बात के लिएऔरऔर भी

अपने ही सुख के बारे में सोचते-सोचते हम अक्सर दुख से दबे रहते हैं। फॉर्मूला याद नहीं रखते कि “दुख तुम्हें क्या तोड़ेगा, तुम दुख को तोड़ दो। बस अपनी आंखें औरों के सपनों से जोड़ दो।” देश में इस वक्त 80% लोग बमुश्किल गुजर-बसर कर पाते हैं जबकि नेता-अभिनेता, क्रिकेटर, दलाल, ठेकेदार व धंधेबाज़ों से मिलकर बनी 5% आबादी का कैश-फ्लो इतना है कि उन्हें बचाने की ज़रूरत नहीं। बाकी बचे 15% लोग ही अपनी बचतऔरऔर भी

पानी हमेशा नीचे भागता है और अंततः या तो धरती में सोख लिया जाता है या नदी व समुंदर में समा जाता है। लेकिन धन हमेशा ऊपर उसी तरफ भागता है जहां वह ज्यादा बढ़ सकता है। इस समय मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अमेरिका समेत तमाम विकसित देश ब्याज दर बढ़ाते जा रहे हैं। इससे वहां के सरकारी बांडों की यील्ड बढ़ गई है और रुपया खोखला होता जा रहा है तो विदेशी निवेशक नौऔरऔर भी

संस्थागत निवेशक शेयर बाजार में कभी भावों को भगवान नहीं मानते। उन्हें अच्छी तरह पता है कि वे भावों को अपनी खरीद या बिकवाली के दम पर आसमान पर पहुंचा या पाताल तक गिरा सकते हैं। इन संस्थागत निवेशकों में तमाम एफपीआई के साथ-साथ देशी म्यूचुअल फंड और एलआईसी जैसी बीमा कंपनियां शामिल हैं। हां, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ताकत देशी सस्थाओं पर अक्सर भारी पड़ती है। इनका प्रमाण है एचडीएफसी और इन्फोसिस जैसी दमदार कंपनियोंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में पुराने किस्म के अधिकांश ट्रेडर भावों को भगवान मानते हैं। यह रिटेल ट्रेडर के नज़रिए से एक हद तक सही भी है क्योंकि भावों पर उनका कोई वश नहीं होता। जिस तरह दरिया में दो-चार जग ही नहीं, कई बाल्टी भी पानी डाल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता, उसी तरह रिटेल ट्रेडरों की खरीद-फरोख्त का शेयरों के भाव पर कोई खास असर नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है बांध का पानी खोलने से। मुश्किलऔरऔर भी