देश में काम का और काम भर का रोज़गार तब तक नहीं पैदा होगा, जब तक मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र जमकर नहीं बढ़ता। जीडीपी बढ़ रहा है। लेकिन उसमें मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान नहीं बढ़ रहा। मनमोहन सरकार ने 2012 में इसे 2022 तक 25% और मोदी सरकार ने 2014 में इसे 2025 तक 25% पर पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन यह 2012 में 16% था और अब भी 16% के आसपास अटका है। दरअसल जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंगऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मानें तो देश में रोज़गार की कहीं कोई कमी नहीं है। परसों लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र ने 18 सालों का रिकॉर्ड रोज़गार पैदा किया है। लगा जैसे कि वे सरकार का कोई आंकड़ा दे रहे हों। लेकिन वे दरअसल 23 मई को आए विदेशी बैंक एचएसबीसी के परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) के आधार पर यह दावा कर रहे थे। इस इंडेक्स में कोई आंकड़ाऔरऔर भी

विचित्र-सी हकीकत है कि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। भारत का जीडीपी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ गति से बढ़ रहा है। लेकिन आम लोगों की खपत घटती जा रही है। सरकार की तरफ से 31 मई 2024 को जारी अद्यतन आंकड़ों के मुताबिक इसे दर्शानेवाला निजी अंतिम खपत खर्च (पीएफसीई) वित्त वर्ष 2021-22 में जीडीपी का 58.1% हुआ करता था, जबकि 2023-24 तक घटकर 55.8% रह गया है। निजी खपत बढ़ेगी नहीं तो निजी उद्योगऔरऔर भी

मोदी सरकार ने दस साल में अवाम पर जमकर टैक्स लगाए और उसे सत्ता तंत्र की सेवा में लगाने के साथ-साथ सरकार का पूंजीगत खर्च बढ़ाने में लगा दिया। इससे जहां अंदर-बाहर सबको दिखाने के लिए सड़कों से लेकर हवाई अड्डों समेत तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर चमकने लगा, वहीं सरकारी ठेकों से उसके करीबी लोगों व कंपनियों को अच्छा धंधा मिल गया और इनके कमीशन से इलेक्टोरल बॉन्ड के रूप में भाजपा का खजाना भरता चला गया। लेकिन सुप्रीमऔरऔर भी

शेयर बाज़ार बम-बम कर रहा है। निफ्टी और सेंसेक्स बराबर नई ऊंचाई छू रहे हैं। लेकिन यह तेज़ी तभी जारी रह सकती है जब अर्थव्यवस्था का तेज़ विकास होता रहे और यह तभी संभव है जब मोदी सरकार अब साहसी व गंभीर आर्थिक सुधार लागू करे। देश का उद्योग समुदाय, खासकर बड़ी देशी-विदेशी कंपनियां और सीआईआई व फिक्की जैसे उद्योग संगठन ऊपर-ऊपर आश्वस्त हैं कि कमज़ोर राजनीतिक बहुमत के बावजूद मोदी सरकार देश में तमाम मूलभूत आर्थिकऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवा, महिला, गरीब व किसान की जो चार जातियां गिनाईं, उनकी सरकार इनमें से किसी की भी हितैषी नहीं है। दिक्कत यह है कि वो समूचे बिजनेस समुदाय की भी परवाह नहीं करती। उसे परवाह है तो चंद देशी-विदेशी उद्योगपतियों की, जो उन पर भरपूर चंदा और खजाना लुटाते हैं। साथ ही उनका एजेंडा संघ परिवार के तमाम अकर्मण्य लोगों को कहीं न कहीं सत्ता से जुड़ी कुर्सियों पर एडजस्ट कर देना है।औरऔर भी

मोदी सरकार बार-बार दंभ भरती है कि वह संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के 33% प्रतिनिधित्व का नारी शक्ति वंदन अधिनियम ले आई। वह इसे महिलाओं के सशक्तिकरण का बड़ा कदम बताती है। लेकिन इसमें ऐसे पेंच फंसा दिए हैं कि यह पांच साल बाद 2029 के आम चुनावों में भी शायद ही लागू हो पाए। वहीं, उसकी नीतियों से हो यह रहा है कि देश की श्रमशक्ति में नारी शक्ति की भागीदारी घटती जा रही है।औरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में किसानों से वादा किया था कि उन्हें फसल का इतना एमएसपी देंगे कि सारी लागत का आधे से ज्यादा मुनाफा मिल जाएगा। यह वादा हवाहवाई होने के बाद उन्होंने साल 2016 में घोषणा की कि किसानों की आय छह साल में दोगुनी हो जाएगी। यह घोषणा भी खोखली निकली। इस बीच वे 2020-21 में संसद में बिना बहस के पास कराकर तीन कृषि कानून ले आए जिसमें कृषि में कॉरपोरेटऔरऔर भी

क्या कोई व्यक्ति देश के शहरी इलाके में 1286 रुपए और ग्रामीण इलाके 1089 रुपए में महीने भर खाने-पीने, कपड़े-लत्ते और रहने के साथ ही स्वास्थ्य व शिक्षा का इंतज़ाम कर सकता है? आप कहेंगे कि इसका मतलब शहर में प्रतिदिन 42.87 रुपए और गांव में 36.30 रुपए में गुजारा करना, जो कि असंभव है। लेकिन भारत सरकार के नीति आयोग ने संयुक्त राष्ट्र संस्था यूएनडीपी के साथ मिलकर मल्टी डायमेंशन पॉवर्टी का यही पैमाना बनाया किऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18वीं लोकसभा चुनावों की घोषणा से कुछ महीने पहले विपक्ष की जातिगत जनगणना के अभियान को काटने के लिए कहा था कि देश में केवल चार ही जातियां हैं – गरीब, युवा, महिलाएं और किसान। सत्ताबल और धनबल के बावजूद मोदी की पार्टी भाजपा को जनता ने 543 सीटों की लोकसभा में से बहुमत से 32 कम केवल 240 सीटें ही दी है। आज मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में टीडीपी और जेडी-यूऔरऔर भी