गिरते शेयर बाज़ार में कमाने का काम डी-मार्ट के मालिक और ‘ओल्ड फॉक्स’ के नाम से मशहूर राधाकृष्ण दामाणी जैसे उस्तादों पर छोड़ देना चाहिए। इस दरमियान रिटेल ट्रेडरों के लिए सुरक्षित तरीका यह है कि वे बाज़ार में गिरावट की चाल, चरित्र व चेहरे को सीखने-समझने पर फोकस करें। बाज़ार पहले से ही संकेत दे देता है कि आगे गिरावट का बड़ा अंदेशा है। इसे समझने के बहुत सारे संकेतक हैं जिन्हें हम बाज़ार का मौका-मुआयनाऔरऔर भी

‘लीवरेज्ड’ सौदे वे होते हैं जिनमें सारा मार्जिन का खेला होता है। कम लगाओ, कई गुना कमाओ। लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सच है। कम लगाओ, कई गुना गवांओ। ऑप्शंस में दांव उल्टा पड़ा तो सारा का सारा ही डूब जाता है। अपनी पूंजी इस तरह डुबाने का रिस्क न तो कोई रिटेल ट्रेडर ले सकता है और न ही उसे ऐसा रिस्क लेना चाहिए क्योंकि ऐसा रिस्क लेने का मतलब होगा अंततः ट्रेडिंग करने सेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार अभी गिर रहा है और गिरता ही जा रहा है। यकीनन इस गिरावट का अंत कहीं न कहीं होगा। लेकिन यह गिरावट कब तक जारी रहेगी, कहा नहीं जा सकता। इस बीच क्या किया जाए? विद्वान लोग यह भी कहते हैं कि उठते बाज़ार में तो हर कोई कमा सकता है। लेकिन गिरते बाज़ार में जो कमा ले, वही शेयर बाज़ार का असली शेर है। दिक्कत है कि रिटेल ट्रेडर को ऐसा शेर बनने कीऔरऔर भी

ब्याज दरों के भारी अंतर के कारण भारत में अमेरिका से उधार लिया गया धन आराम से 5% मुनाफा कमा सकता है। इस पर यकीनन डॉलर और रुपए की विनिमय दर का असर पड़ेगा। डॉलर की आवक या सप्लाई बढ़ती है तो रुपया महंगा होता है और एक डॉलर में कम रुपए मिलते हैं। जैसे, 15 दिसंबर 2021 को एक डॉलर में 76.34 डॉलर मिल रहे थे, जबकि 14 जनवरी 2022 को एक डॉलर में 74.16 रुपएऔरऔर भी

अमेरिका में ब्याज दर कम, भारत में ज्यादा। वहां से उधार लो, यहां लगाओ और अंतर से कमाई कर लो। इसे कैश कैरी ट्रेड या आर्बिट्रेज कहते हैं। सवाल उठता है कि क्या टैपरिंग के बाद अमेरिका से डॉलर के निकलकर भारत आने पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यकीनन पड़ेगा। लेकिन यह असर इतना कम होगा कि उससे धन के प्रवाह पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। अमेरिका में ब्याज दर अभी 0.25% है। इसे टैपरिंग के दौरानऔरऔर भी

टैपरिंग का सीधा-सा मतलब होता है अर्थव्यवस्था को दिए जा रहे वित्तीय प्रोत्साहन से हाथ खींचना। अमेरिका में फेडरल रिजर्व की योजना है कि वह इस साल मार्च तक सिस्टम में बॉन्ड खरीदकर डॉलर डालने के कार्यक्रम  में कटौती या टैपरिंग शुरू कर देगा। उसके बाद वह खरीदे गए बॉन्डों को निकालने लगेगा। इससे बॉन्ड के भाव घटेंगे और उसी अनुपात में उन पर यील्ड या ब्याज की दर बढ़ने लगेगी जिससे बढ़ती मुद्रास्फीति को रोकने मेंऔरऔर भी

अमेरिका में अप्रैल 2020 में कोविड का प्रकोप शुरू होने के समय से वहां का केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में डॉलर झोंक रहा है। नतीजतन, उसकी बैलेंस शीट 12 जनवरी 2022 तक 8788.30 अरब डॉलर की हो चुकी थी। इसमें 1425 अरब डॉलर का इजाफा बीते साल 2021 में हुआ है। फेड सरकारी बॉन्ड, बंधक रखी प्रतिभूतियों से जुड़े बॉन्ड और कॉरपोरेट बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में डॉलर डालता है। इससे वित्तीय बाज़ार में नकदीऔरऔर भी

नए साल के दो हफ्तों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने उम्मीद से उलट हमारे शेयर बाजार में खरीदने से ज्यादा बेचने का सिलसिला जारी रखा है, जबकि इसी दौरान अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने टैपरिंग या बॉन्ड बेचकर सिस्टम से धन निकालने के बजाय बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में लगभग 31 अरब डॉलर डाले हैं। बॉन्ड खरीदने का मतलब है फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट का बढ़ जाना, जिसका सीधा रिश्ता है भारतीय शेयर बाज़ारऔरऔर भी

किसी-किसी दिन होता यह है कि तमाम सूचकांकों के सारे के सारे प्रमुख स्टॉक्स गिरे रहते हैं। पूरे बाज़ार में पस्ती छाई रहती है। ऐसे माहौल में हम कहां से स्टॉक्स चुन सकते हैं? दिक्कत यह है कि रिटेल ट्रेडर को उन्हीं स्टॉक्स में ट्रेड करना चाहिए जिनमें बढ़ने की भरपूर गुंजाइश हो। उनका रिस्क प्रोफाइल ऐसा है कि उन्हें शॉर्ट सेलिंग से परहेज़ करना चाहिए। ऐसे में एनएसई में सूचकांकों के पेज़ पर तीसरे सेगमेंट मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हमारा या किसी भी बाहर वाले का ‘ज्ञान’ मोटामोटी ही होता है। बाज़ार की बारीकियां हर ट्रेडर को खुद अपने अभ्यास से पकड़नी होती है। फिर यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि बाज़ार में इस समय खेल क्या चल रहा है। मसलन, फिलहाल बाज़ार में बड़ी ऊंच-नीच चल रही है। समूचे बाज़ार में रुख बढ़ने का होता है। लेकिन निफ्टी और सेंसेक्स को चंद स्टॉक्स के दम पर दबा दिया जाता है। इसमेंऔरऔर भी