भारत का व्यापक जनमत चीन के खिलाफ है। फिर भी मोदी सरकार ने इसकी कोई परवाह न करते हुए 10 मार्च को सीमा से सटे देशों से आनेवाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नियमों में ढील दे दी। बता दें कि इसी सरकार ने अप्रैल 2020 में जारी प्रेसनोट-3 के तहत चीन द्वारा मौका ताड़कर भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए थे। अब चीन की कंपनियों को भारतीय कंपनियों में 10% तकऔरऔर भी

जो दिख रहा है और सरकारी विज्ञापनों में खूब दिखाया जा रहा है, वो विकास है। जो नहीं दिख रहा है, मीडिया के शोर में छिपाया जा रहा है, वो विनाश है। देश की मानव संपदा और प्राकृतिक संपदा का विनाश। भारतवर्ष, जो महज एक देश ही नहीं, पूरी सभ्यता है, वो विपुल संभावनाओं वाला राष्ट्र आज अंदर ही अंदर विखण्डित व खोखला होता जा रहा है। करीब 20 दिन पहले एक इंक निर्माता कंपनी के अधिकारीऔरऔर भी

देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक विकास हो रहा है। सड़कें बन रही हैं। चकाचक हाईवे बने जा रहे हैं। पुल बन रहे हैं। हवाई अड्डे बन रहे हैं। बंदरगाह विकसित हो रहे हैं। शहर-शहर मेट्रो चलने लगी हैं। जम्मू-कश्मीर में दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्क पुल 22 साल में बनकर चालू हो गया। जो दिखता है वो बिकता है। जो नहीं दिखता, वो गोपनीय है। विकास के ठेकों पर कमीशन बढ़ते-बढ़तेऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में बड़ों का नाम लेकर छोटों को चरका बढ़ाने का सिलसिला दशकों से चला आ रहा है। किसी ज़माने में कहा जाता था कि फलानां शेयर हर्षद मेहता ने खरीदा है। केतन पारिख से लेकर दामाणी का नाम भी चलता रहा। फिर राकेश झुनझुनवाला का झुनझुना बजने लगा। आज वही सिलसिला एफआईआई और म्यूचुअल फंडों व डीआईआई तक आ गया है। कहा जाता है कि फलानां शेयर एफआईआई खरीद रहे हैं या कोई नामीऔरऔर भी

सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का कहना है कि रुपए को और गिरने से रोकना बेहद ज़रूरी है। लेकिन रुपया डॉलर के मुकाबले बेरोकटोक गिरता ही जा रहा है, भले ही डॉलर सूचकांक बढ़े या गिरे। डॉलर सूचकांक इस साल जनवरी में 98.25 हुआ करता था। मार्च अंत में 100.59 हो गया। अब फिर 98.80 हो गया है। लेकिन रुपया केवल गिरना जानता है। वो जनवरी में औसतन प्रति डॉलर 90.73 का हुआ करताऔरऔर भी

निजी स्वार्थ में डूबा आत्मविभोर व्यक्ति सत्ताशीर्ष पर बैठकर देश-दुनिया का कितना नुकसान कर सकता है, इसे पश्चिम एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया है। प्रधानंमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25-26 फरवरी को जेरूसलम जाकर फर्जी मेडल के चक्कर में ‘फादरलैंड’ कहकर इज़रायल को सिर न चढ़ाया होता तो शायद अमेरिका के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला करने की उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती। इस हमले के बाद ब्रेन्ट कच्चे तेल के दामऔरऔर भी

इधर मोदी का राजनीतिक विजय-रथ आसमान का रुख किए हुए है, उधर भारतीय रुपया रसातल में डूबता बराबर नई-नई तलहटी पकड़ता जा रहा है। आज एक डॉलर 95.91 रुपए और यूरो 112.27 रुपए पर जा पहुंचा। कमाल की बात यह है कि जनवरी 2025 से फरवरी 2026 तक जब रुपया खाक बनता जा रहा था, तब सरकारी और निजी अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि भारत ‘गोल्डीलॉक्स’ अवस्था से गुजर रहा है, जहां आगे सब अच्छा ही अच्छाऔरऔर भी

दुनिया में छिड़े युद्ध जैसे बाहरी कारक और देश के भीतर मुद्रास्फीति, चालू खाते व पूंजी खाते जैसे घरेलू कारक यकीनन रुपए के गिरने की वजह बनते हैं। लेकिन हमें इस बार रुपए के लगातार गिरते जाने की वजह को समझने के लिए दूसरे कारकों पर भी गौर करना होगा। ध्यान दें कि जनवरी से दिसंबर 2025 तक दुनिया की छह मुद्राओं की बास्केट के सापेक्ष डॉलर की शक्ति को नापनेवाला डॉलर सूचकांक 108.09 से गिरकर 98.25औरऔर भी

हमारा रुपया हाथ से निकल चुका है। अब इसे भारतीय रिजर्व बैंक का कोई हस्तक्षेप ज्यादा गिरने से नहीं रोक सकता। वैसे रिजर्व बैंक खुद कहता रहा है कि वो विदेशी मुद्रा बाज़ार में तभी हस्तक्षेप करता है, जब रुपया ज्यादा ही चपल व चंचल हो जाता है। वो इसकी इस वोलैटिलिटी को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा के स्पॉट और फॉरवर्ड बाज़ार, दोनों में डॉलर बेचता है। लेकिन न तो वो देश से विदेशी निवेशकों केऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में संस्थागत निवेशकों से लेकर व्यक्तिगत निवेशकों में बेचैनी छाई हुई है। इस साल 2026 में जनवरी से अप्रैल तक के चार महीनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने 1.92 लाख करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं। यह पूरे कैलेंडर वर्ष 2025 में उनकी कुल ₹1.66 लाख करोड़ की निकासी से भी ज्यादा है। भारतीय कंपनियों में एफपीआई की शेयरधारिता घटकर अभी 16.7% पर आ गई है। यह 2010 के बाद पिछले 16 सालोंऔरऔर भी