देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक विकास हो रहा है। सड़कें बन रही हैं। चकाचक हाईवे बने जा रहे हैं। पुल बन रहे हैं। हवाई अड्डे बन रहे हैं। बंदरगाह विकसित हो रहे हैं। शहर-शहर मेट्रो चलने लगी हैं। जम्मू-कश्मीर में दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्क पुल 22 साल में बनकर चालू हो गया। जो दिखता है वो बिकता है। जो नहीं दिखता, वो गोपनीय है। विकास के ठेकों पर कमीशन बढ़ते-बढ़ते 40% हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड में ‘चंदा दो, धंधा लो’ की इस धांधली को अवैध ठहरा दिया। तब भी इस ‘विकास’ का बाल बांका नहीं हुआ। जो नहीं दिख रहा है या ‘नरो वा कुंजरो वा’ का भ्रम भी मीडिया के शंखनाद में छिपा लिया जा रहा है, वो यह कि तमाम छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं। विश्वविद्यालयों की फैकल्टी खाली पड़ी हैं या फिजिक्स का विषय समाजशास्त्र का ज्ञानी प्रोफेसर भी नहीं, पोंगा पंडित पढ़ाने लगा है। राज्य-दर-राज्य हज़ारों सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। कोरोना काल में जब दुनिया भर में तमाम देशों की सरकारें टैक्स के खजाने से अवाम के बैंक खाते में अतिरिक्त धन डालकर क्रयशक्ति को घटने से रोक रही थीं, तब हमारी सरकार टैक्स वसूली बढ़ाने में व्यस्त थी। लॉक-डाउन मे लाखों मजदूरों को सड़कों पर मरने के लिए अकेला छोड़ दिया गया। आज देशी-विदेशी पूंजी तक भारत छोड़कर भाग रही है। अब सोमवार का व्योम…
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