देश में धन के धमनी-तंत्र भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने पर मोदी सरकार की वक्री दृष्टि साल 2018 के मध्य में तब पड़ी, जब उसके पहले कार्यकाल के चार साल बीत चुके थे। तब रिजर्व बैंक के गवर्नर लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के ग्रेजुएट और ऑक्सफोर्ड से लेकर येल यूनिर्विसिटी से एम.फिल व डॉक्टरेट करनेवाले कुशल अर्थशास्त्री ऊर्जित पटेल थे। ऊर्जित पटेल ने नोटबंदी का भी विरोध किया था। लेकिन उनकी एक न चली। 14 सितंबर 2018औरऔर भी

एक बात में मोदी सरकार को कोई भी मात नहीं दे सकता, न भूतो न भविष्यति। वो है धन की उगाही। उसने 146 करोड़ देशवासियों में से किसी को नहीं छोड़ा। जीएसटी लगाकर नवजात बच्चे से लेकर मरनेवाले तक से टैक्स वसूलने की व्यवस्था कर ली। वो अपनी धन उगाही में कोई खलल नहीं चाहती। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल जब भी सस्ता हुआ, उसने एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाकर अपना खजाना भर लिया और आम ग्राहकों तक इसकाऔरऔर भी

निवेश हमारे आर्थिक व वित्तीय जीवन में छाई अनिश्चितता से लड़ने का साधन है। जिस तरह युद्ध जीतने के लिए सेना बनाकर चला जाता है, जिसमें थल, वायु व नौसेना की अलग-अलग भूमिका होती है, उसी तरह निवेश में सफलता के लिए पोर्टफोलियो बनाकर चलना पड़ता है। कुछ धन सोने में, कुछ एफडी व पीपीएफ जैसे स्थाई आय के माध्यमों में, कुछ हिस्सा ज़मीन-जायदाद में और कुछ हिस्सा शेयर बाज़ार में। शेयर बाज़ार में भी कुछ कंपनियांऔरऔर भी

विकास और विकसित भारत 146 करोड़ भारतवासियों में से हर किसी को चाहिए। यह हम सबकी आकांक्षाओं और सपनों का केंद्र है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम इंडिया में शामिल भाजपा शासित तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री जिस विकास और विकसित भारत का एजेंडा चला रहे हैं, उसके केंद्र में हैं मात्र कुछ हज़ार कंपनियां जिनका सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रुपए से ज्यादा है। उनके विकसित भारत के केंद्र में न किसान है, न मजदूर, नऔरऔर भी

देश में एक बार फिर विकसित भारत और ट्रिलियन-ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का राग बजना शुरू हो गया है। फर्क बस इतना है कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गेंद राज्यों के पाले में डालकर निश्चिंत हो गए हैं। उन्होंने खुद को नाम जपने तक सीमित कर लिया है। पिछले हफ्ते 103 रेलवे स्टेशनों का लोकार्पण एक साथ किया और इन्हें अभी से विकसित भारत के अमृत भारत स्टेशन घोषित कर दिया। फिर शनिवार को नीति आयोग की दसवींऔरऔर भी

प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी झूठ बोलें तो समझ में आता है क्योंकि उन्हें झूठ बोलने की आदत और असाध्य बीमारी है। झूठ बोलना उनका संस्कार है। यह अकारण नहीं है कि प्रधानमंत्री पद की मर्यादा को बचाने के लिए आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार उनके शासन में भारतीय संसद की कार्यवाही में झूठ शब्द को ही असंसदीय घोषित कर दिया गया। सरकार के मंत्री और भाजपा नेता झूठ बोले तो भी स्वीकार्य है क्योंकि उन्हें राजनीतिऔरऔर भी

देश में इस समय वर्तमान या भविष्य का अमृतकाल नहीं, बल्कि अतीत का वैदिक काल चल रहा है। वेदों में शब्द को ही प्रमाण और कह देने से हो जाने की धारणा थी। ईश्वर ने कहा कि एकोहम बहुष्याम तो एक से अनेक बनते चले गए। भाजपा व संघ की शरण में गए सारे गण व अधिकारी इसी धारणा के संवाहक हैं। नीति आयोग के सीईओ बनाए गए बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम ने भारतीय अर्थव्यवस्था के 4.19 ट्रिलियन केऔरऔर भी

राजा चौपट हो तो सत्यमेव जयते के आदर्श वाले महान देश भारत को भी अंधेर नगरी बनने में देर नहीं लगती। आईएमएफ ने करीब डेढ़ महीने पहले 14 अप्रैल 2025 को जारी वर्ल्ड इकनॉमिक रिपोर्ट में अनुमान जताया था कि विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर घटकर कैलेंडर वर्ष 2025 में 2.8% और 2026 में 3% रह सकती है। इसी रिपोर्ट में कहा गया था कि कैलेंडर वर्ष 2025 या वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जीडीपी 4.187औरऔर भी

शेयर बाज़ार कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। गिरते-गिरते उठ जाना और उठते-उठते गिर जाना उसका स्वभाव है। 25 मार्च को निफ्टी ऊपर में 23,750 से 7 अप्रैल को नीचे में 21750 तक गिर गया। फिर उठा तो 15 मई को 25,115 तक जाने के बाद नीचे उतर गया। ठीक उस वक्त जब अच्छे-खासे निवेशक व ट्रेडर एक दिशा पकड़ चुके होते हैं, तभी बाज़ार दूसरी दिशा पकड़ लेता है। बाज़ार की ऐसी हरकत अनायास नहीं। इसकेऔरऔर भी

ऑपेरेशन सिंदूर में आकाश और ब्रह्मोस मिसाइलों का जो श्रेय मोदी सरकार के मेक-इन इंडिया अभियान को दिया जा रहा है, उनका सफल परीक्षण 1990 के दशक में ही हो चुका था। हमारे डिफेंस क्षेत्र में बहुत सारी कंपनियां पहले से काम कर रही हैं। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स, भारत डायनेमिक्स, मझगांव शिपबिल्डर्स व कोचीन शिपयार्ड जैसी सरकारी कंपनियों से लेकर निजी क्षेत्र की भारत फोर्ज, आइडियाफोर्ज, एस्ट्रा माइक्रोवेव और डेटा पैटर्न तक। ऊपर से हमारी 41औरऔर भी