वित्त वर्ष 2011-12 का बजट देश और देश की अर्थव्यवस्था के हित में है। शेयर बाजार अभी इसे अपने हित में मानता है या नहीं, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आखिरकार अर्थव्यवस्था ही बाजार की भी मजबूती का आधार बनती है। फिर आज अगर बीएसई सेंसेक्स करीब 600 अंक उछला है तो जरूर बाजार ने भी इसका अहसास किया है। हालांकि सेंसेक्स बाद में केवल 122.49 अंकों या 0.69 फीसदी की बढ़त के साथ 17,823.40 परऔरऔर भी

मेरी मानिए तो आज सिर्फ और सिर्फ बजट को देखिए। देखिए कि बाजार उसे कैसे लेता है और सोचते रहिए कि भविष्य के निवेश की प्लानिंग कैसे करेंगे। वैसे तो बजट के सारे दस्तावेज आपको सरकार की खास वेबसाइट पर मिल जाएंगे। लेकिन मेरा कहना है कि 11 बजे से लोकसभा में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के भाषण को ध्यान से सुन लेंगे तो मोटामोटी तस्वीर साफ हो जाएगी। निवेश के लिहाज से बजट में क्या देखा-सुनाऔरऔर भी

समझ में नहीं आता इन दुखी आत्माओं का क्या करूं? एक दुखी आत्मा ने लिखा है, “हेलो! आप यहां हर वक्त लिखते हैं कि मार्केंट मजबूत रहेगा। लेकिन हर वक्त वो नीचे ही नीचे जा रहा है। आपने लिखा था कि 6200 से 7000 तक निफ्टी जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। अगर आपको सही मालूम होता तो क्यों नहीं आप सबको बोलते कि निफ्टी 4500 तक जाएगा। जब निफ्टी 6200 था तब सब अपना बेच देते औरऔरऔर भी

यूं तो ममता बनर्जी का रेल बजट सिर्फ राजनीति का झुनझुना भर है। 85 पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) परियोजनाओं की घोषणा भी बहुत बढ़ी-चढ़ी लगती है। लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि भारतीय रेल निजीकरण की दिशा में बढ़ रही है। आज ही आई आर्थिक समीक्षा ने आम बजट को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। राजकोषीय घाटे को जीपीजी के 4.8 फीसदी पर लाना दिखाता है कि सरकार अपने खजाने को चाक-चौबंद करने के प्रतिऔरऔर भी

उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। बजट से पहले केवल एक कारोबारी दिन बचा है। लेकिन बाजार में छाई निराशा सुरसा के मुंह की तरह विकराल होती जा रही है। निफ्टी आज साढ़े तीन फीसदी से ज्यादा गिरकर 5242 तक चला गया। सेंसेक्स भी 600 अंक से ज्यादा गिरकर 17,560 तक पहुंच गया। हालांकि बंद होते-होते बाजार थोड़ा संभला है। इस गिरावट के पीछे खिलाड़ियों के खेल अपनी जगह होंगे। लेकिन ट्रेडर और निवेशक अब नए फेरऔरऔर भी

बाजार में 800 अंकों के सुधार का मतलब यह नही है कि अंधेरा खत्म, मुसीबत टल गई। हम जैसे ही यह सोचते हैं कि सब कुछ पटरी पर आ गया है, उससे पहले ही बिकवाली का नया झोंका सब कुछ फिर से पटरा कर देता है। कल मैं एक बिनजेस चैनल पर कार्यक्रम देख रहा था जहां कुछ ज्ञानी लोग एक सर्वेक्षण पर बहस कर रहे थे जिसका निष्कर्ष यह था कि देश के 97 फीसदी लोगऔरऔर भी

बाजार की मनोदशा खराब चल रही है। फंड मैनेजर अब भी करीब 15 फीसदी करेक्शन या गिरावट की बात कर रहे हैं। इस सेटलमेंट में बहुत ही कम रोलओवर हुआ है। अगले महीने बजट आना है। मुद्रास्फीति की तलवार सिर पर लटकी है। ब्याज दरों का बढ़ना भी बड़ी चिंता है। इन सारी चिंताओं से घिरा निवेशक पास में कैश की गड्डी होने के बावजूद बाजार में नहीं घुसना चाहता। अमेरिकी बाजार इधर काफी बढ़ चुके हैंऔरऔर भी

मंत्रालयों के फेरबदल ने बाजार को कुछ संदेश दिए हैं। यह जानामाना सच है कि उद्योगपति मंत्रालय व मंत्रियों के साथ रिश्ते बना लेते हैं जिनकी बदौलत उन्हें सरकारी नीतियों के बारे में पहले से पता चल जाता है और इसका इस्तेमाल वे अपने धंधे में करते हैं। इसलिए मंत्रालय में मंत्री बदल जाने से कभी-कभी कंपनियों का नसीब भी इधर से उधर हो जाता है। शरद पवार को कृषि मंत्री बनाए रखना सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीतिकऔरऔर भी

बाजार के रुख और रवैये का बदलना अब इतना आसान नहीं रह गया है क्योंकि ट्रेडरों का बहुमत मानता है कि हम निफ्टी में 5500 व 4700 की तरफ जा रहे हैं। वे मानते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री को पद छोड़ना पड़ेगा और इससे बाजार की स्थितियां जटिल हो जाएंगी। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। हालांकि उनके तर्क में दम नहीं नजर आता, लेकिन उनकी हरकतें पूरी तरह उनकी सोच के अनुरूप हैं। 100औरऔर भी

बाजार में कल 337 अंक के तेज सुधार के बाद मंदड़ियों की तरफ से बिकवाली का आना लाजिमी था। फिर इनफोसिस के नतीजे भी चौंकानेवाले नहीं निकले। 30-32 के पी/ई अनुपात पर अगर आप इनफोसिस द्वारा बाजार को पीछे छोड़ देने की बात सोचते हैं तो यह भारत की दूसरे नबंर की आईटी कंपनी से वाकई कुछ ज्यादा ही अपेक्षा करना हो जाएगा। हालांकि निवेशकों का एक वर्ग इस स्टॉक को तब तक पसंद करता रहेगा जबऔरऔर भी