बाजार में कोई दिशा नहीं नज़र आती। तेजड़िए और मंदड़िए अपने-अपने तीर-कमान और तर्क लेकर भिड़े हुए हैं। मंदड़ियों के पास शॉर्ट सौदे करने की तमाम वजहें हैं। जैसे, अर्थव्यवस्था का कामकाज ठीक नहीं है, जीडीपी घट रहा है, राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है, कंपनियों का लाभार्जन दबाव में है और बराबर डाउनग्रेड हो रहे हैं। इन सबसे ऊपर उनकी पक्की राय है कि निफ्टी 4000 तक गिर सकता है और अगले छह महीनों में बाजार मेंऔरऔर भी

बाजार कमजोरी के साथ खुला और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े आने तक कमजोर ही बना रहा। बाजार में आम धारणा थी कि इसकी विकास दर 6.9 फीसदी रहेगी और सचमुच यह 6.9 फीसदी ही रही। लेकिन बाजार का चाल-चलन इस कदर बदल चुका है कि ट्रेडरों को बहुत सारी सूचनाएं ‘गजब की तेजी’ से मिल जाती हैं और वे उसके हिसाब से बहकने लगते हैं। पहले जीडीपी के 6.2 फीसदी बढ़ने की अफवाह खबर केऔरऔर भी

देश की आर्थिक विकास दर जून से सितंबर 2011 तक की तिमाही में 6.9 फीसदी रही है। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में दो सालों से ज्यादा वक्त में किसी भी तिमाही में हुई सबसे कम विकास दर है और लगातार तीसरी तिमाही में 8 फीसदी से नीचे रही है। चिंता की बात यह है कि इस दौरान मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर मात्र 2.7 फीसदी रही है, जबकि खनन क्षेत्र बढ़ने के बजाय 2.9 फीसदी घटऔरऔर भी

संसद में छाया राजनीतिक गतिरोध सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को रिटेल में एफडीआई या सिविल एविएशन को विदेशी एयरलाइंस के लिए खोलने जैसे बड़े फैसले नहीं लेने देगा। अभी तक इस सेटलमेंट में इन दोनों ही सेक्टरों के स्टॉक्स काफी ज्यादा खरीदे जा चुके हैं। अब वे कैश सेटलमेंट के नए शिकार हैं। इसलिए इनमें खरीद करते वक्त काफी सावधान रहने की जरूरत है। पिछले सेटलमेंट में मैंने आपको डिश टीवी के बारे में जो बताया था, वोऔरऔर भी

देश की औद्योगिक रफ्तार में आती कमी और डॉलर के मुकाबले रुपए की कमजोरी के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने भारतीय शेयर बाजार के बैरोमीटर, बीएसई-सेसेक्स की 30 में से 19 कंपनियों में सितंबर 2011 की तिमाही के दौरान अपना निवेश घटा है। जिन कंपनियों में एफआईआई का निवेश स्तर कम हुआ है, उनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा मोटर्स और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) शामिल हैं। बीएसई व एनएसई पर उपलब्ध ताजा जानकारी के अनुसार जून सेऔरऔर भी

बाजार दो साल के न्यूनतम स्तर को छूकर लौटा है। इस मुकाम पर निवेशकों के विश्वास को फिर से जमाना एकदम टेढ़ी खीर है। बल्कि अभी का जो माहौल है, उसमें हालात के और बदतर होते जाने के ही आसार हैं। सरकार के बयान और कदम बेअसर हैं क्योंकि वे खोखले हैं और उनकी दिशा भी सही नहीं है। आपूर्ति को संभालकर एमसीएक्स में हस्तक्षेप के जरिए कमोडिटी के भाव थामे जा सकते थे। वहीं, करेंसी डेरिवेटिव्सऔरऔर भी

दोपहर साढ़े बारह बजे तक सेंसेक्स जब दो सालों के न्यूनतम स्तर 15478.69 और निफ्टी 4640.95 तक जा गिरा तो हर तरफ कोहराम मच गया। गनीमत है कि उसके बाद स्थिति संभलने लगी और सेंसेक्स अंततः 2.27 फीसदी की गिरावट के साथ 15,699.97 और निफ्टी 2.20 फीसदी की गिरावट के साथ 4706.45 पर बंद हुआ। असल में सेंसेक्स आज सुबह खुला ही करीब-करीब 100 अंक गिरकर, जबकि इतनी कमजोर शुरुआत की कोई ठोस वजह नहीं थी। इसनेऔरऔर भी

कोई भी कह सकता है कि लगातार नौ सत्रों तक घाटा खाने के बाद सेंसेक्स का उठना लाजिमी था और इतनी ऊंचाई से गिरने के बाद तो मरी हुई बिल्ली भी थोड़ा उछलती है। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। जब कुछ भी सामान्य नहीं रहा तो बेचारे निवेशक गफलत में पड़ गए कि सब कुछ बाहर से आ रही बुरी खबरों का नतीजा है। तभी अचानक उन्हें अहसास होता है कि ऐसा नहीं था तो झटका लगनाऔरऔर भी

बाजार के बारे में इसके अलावा खास कुछ देखने-समझने को नहीं है कि इस समय हर किसी पर डर का घटाटोप छाया हुआ है। लोगबाग सेंसेक्स के 14,000 तक गिर जाने की बात कहने लगे हैं। एक अतिरेकवादी ने तो मुझे ई-मेल भेजा है कि सेंसेक्स 7500 तक चला जाएगा और मेरे पास बस मुस्कराने के अलावा इस पर कुछ कहने को नहीं था। रोलओवर के दौरान ऐसा होता है। अतिवादी सक्रिय हो जाते है। अफवाहें अपनेऔरऔर भी

निफ्टी 0.59 फीसदी और गिरकर 4905.80 पर पहुंच गया। बाजार में हल्ला यही है कि अब सब कुछ बरबाद होने जा रहा है। अरे! सब कुछ तो पहले ही बरबाद हो चुका है। अब बाजार से और कितनी बरबादी की उम्मीद की जा सकती है। आज की तारीख में सरकार की तरफ से रिटेल व छोटो निवेशकों को खींचने या उन्हें मदद करने की कोई नीति नहीं है। सारी की सारी नीतियां एफआईआई समर्थक हैं। असल में,औरऔर भी