बात नहीं बास
वही-वही जुमले। वही-वही बात। बहते पानी में ऐसा हो नहीं सकता! वह तो निर्मल होता है। बास तो हमेशा ठहरे पानी से ही आती है। इसलिए देखें तो सही कि बातों की बास के पीछे आपका ठहराव तो नहीं!और भीऔर भी
वही-वही जुमले। वही-वही बात। बहते पानी में ऐसा हो नहीं सकता! वह तो निर्मल होता है। बास तो हमेशा ठहरे पानी से ही आती है। इसलिए देखें तो सही कि बातों की बास के पीछे आपका ठहराव तो नहीं!और भीऔर भी
हम काम हर कोई नहीं कर सकता। इसलिए हमें काम वही करना चाहिए जो हम सबसे अच्छा कर सकते हैं। बाकी औरों के लिए छोड़ दें। लेकिन आज ये छूट कहां! आज तो हम पैसे के लिए ही काम करते हैं।और भीऔर भी
जो बनाता है, वह बिगाड़ भी सकता है। लेकिन उसके पास बिगाड़ने का हक नहीं होना चाहिए क्योंकि उसकी बनाई चीज सिर्फ उसी की नहीं, औरों की भी होती है। सो, उस चीज को उसके कोप से बचाना जरूरी है।और भीऔर भी
सोचिए, आप किस-किस के प्रति कृतज्ञ हैं? मां-बाप, गुरु, भाई-बंधु, पति/पत्नी! किसी के प्रति नहीं!! हर किसी ने आपका अहित किया है? अगर वाकई आपकी यही सोच है तो आपकी सोच में भारी खोट है।और भीऔर भी
लड़ाई तो हम सभी अपनी-अपनी लड़ते हैं और लड़नी भी चाहिए। दूसरों को काम पड़ने पर ही बुलाते हैं, लेकिन बगैर यह जाने कि वह खुद किन उलझनों में उलझा है। अरे भाई, पहले हाल तो पूछ लो!और भीऔर भी
पुरानी निर्जीव चीजें समय बीतने के साथ या तो कचरा बन जाती है या एंटीक बनकर सजावटी हो जाती हैं। लेकिन ज्ञान का सजीव प्रवाह धूमिल भले ही पड़ जाए, कभी कचरा या एंटीक नहीं बन सकता।और भीऔर भी
देखने में सफलता कितनी भी व्यक्तिगत लगे, लेकिन मूलतः वह सामाजिक होती है। कोई विचार कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह तब तक सफल नहीं होता जब तक उसे सामाजिक तानाबाना नहीं मिलता।और भीऔर भी
लौकिक को अलौकिक बता दो। कर्मफल को विधि का विधान बता दो। मूर्तिभंजक की मूर्तियां बना दो। सुधारक को आराध्य बना दो। इंसान को भगवान बना दो। संघर्ष की धार कुंद करने के ये पक्के सूत्र हैं।और भीऔर भी
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