इस समय देश में गजब का समीकरण है। शीर्ष मौद्रिक संस्था, रिजर्व बैंक देश में किसी से भी एक धेला तक नहीं लेता, जबकि राजनीतिक सत्ता खुद एक धेला भी नहीं कमाती। सब कुछ या तो जनता पर लगाए टैक्स और सरकारी कंपनियों व संस्थाओं के लाभांश या देश की संप्रभुता को भुनाकर लिए गए ऋण से हासिल करती है। अवाम और सरकारी संस्थानों से हर दमड़ी वसूल करने का क्रूर सिलसिला 2014 में प्रधानमंत्री मोदी नेऔरऔर भी

देश की शीर्ष मौद्रिक संस्था, भारतीय रिजर्व बैंक ने झूठ बोलने का हुनर देश की राजनीतिक, वित्तीय व आर्थिक सत्ता यानी केंद्र सरकार से सीखा है। बारह सालों से केंद्र में कुण्डली मारकर बैठी मोदी सरकार ने सरेआम देश-दुनिया और अवाम की आंखों में धूल झोंकने का ऐसा प्रपंच खड़ा कर दिया है जिसे कोई टक्कर नहीं दे सकता, न भूतो न भविष्यति। सरकार का कहना है कि जो सबको दिखता है, वो सच नहीं। जो वोऔरऔर भी

रिजर्व बैंक के अनुसार उसके पास इस समय 880.52 टन सोना है। इसमें से 940 किलो सोना उसने पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में खरीदा। दुनिया में सबसे ज्यादा 8133 टन सोना अमेरिका के केंद्रीय बैंक के पास है। उसके बाद जर्मनी के पास 3350 टन, इटली के पास 2452, फ्रांस के पास 2437 टन, रूस के पास 2330 टन, चीन के पास 2300 टन और स्विटज़रलैंड के पास 1040 टन सोना है। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोषऔरऔर भी

सवाल यह है कि जब हमारे जीडीपी की रीयल विकास दर बम-बम कर रही है, 2025-26 में अंतिम से ठीक पहले के अनंतिम अनुमान के मुताबिक वो 7.7% रही है और इससे पहले वित्त वर्ष 2023-24 में जीडीपी 7.2% और 2024-25 में 7.1% बढ़ा है, तब विदेशी निवेशक और देशी-विदेशी कंपनियां भारत छोड़कर भाग क्यों रही हैं? चालू खाते के घाटे के साथ ही पूंजी खाता इस कदर क्यों घाटे में आ रहा है कि भुगतान संतुलनऔरऔर भी