अपने यहां मांग ज्यादा होने से कारण महंगाई नहीं आई है। दगरअसल, नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद पांच सालों से लोगों की आमदनी घट रही है। कामधंधा मंदा चल रहा है। नतीज़तन मांग घट गई है। वाहनों से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग तक मजबूरन क्षमता से कम उत्पादन कर रहे हैं। फिर भी इस दौरान अगर रिटेल निवेशकों ने शेयर बाज़ार में जमकर धन लगाया है तो ऐसा करनेवाले आम नहीं, बेहद खास लोग हैं।औरऔर भी

मुद्रास्फीति और बॉन्डों पर यील्ड की उल्टी गति ने अमेरिका ही नहीं, सभी देशों के केंद्रीय बैंकों को झकझोर कर रख दिया है। चीन पहले से ही परेशान है। लेकिन अपने यहां सरकार अर्थव्यवस्था की मजबूती का डंका बजा रही है और रिजर्व बैंक महज खानापूरी करने में लगा है। दिक्कत यह भी है कि उसकी संरचना में मूलभूत खामी है। उसे एक साथ तीन भूमिकाएं निभानी होती हैं। पहली है केंद्र व राज्य सरकारों के ऋणऔरऔर भी

अपने यहां बॉन्डों की कोई धूम नहीं है। लेकिन अमेरिका के वित्तीय ही नहीं, आर्थिक जगत तक में इनकी बड़ी अहमियत है। वहां बॉन्डों के यील्ड कर्व की गति इस समय उल्टी चल रही है। आमतौर पर ज्यादा अवधि वाले बॉन्डों पर यील्ड की दर (बॉन्ड के मौजूदा भाव को देखते हुए प्रभावी ब्याज की दर) अधिक होती है, जबकि कम अवधि वाले बॉन्डों पर कम। लेकिन फिलहाल अमेरिका में दस साल के सरकारी बॉन्डों पर यील्डऔरऔर भी

रिजर्व बैंक कांख-कांखकर ब्याज दर बढ़ा रहा है क्योंकि उसे सरकार को बचाना है। अपने यहां सबसे ज्यादा कर्ज सरकार ही लेती हैं, खासकर आम लोगों की बचत योजनाओं का सारा का सारा धन वही डकार जाती है। ब्याज दर ज्यादा बढ़ गई तो सबसे ज्यादा बोझ सरकार पर पड़ेगा। शायद इसीलिए सरकार की कृपा पर रिजर्व बैंक में गवर्नर के पद पर तीन साल का एक्सटेंशन पानेवाले इतिहास के स्नातक शक्तिकांत दास भारतीय अर्थव्यवस्था के मौद्रिकऔरऔर भी

मई में अपने यहां थोक महंगाई की दर 30 साल के उच्चतम स्तर 15.88% पर रही है, जबकि रिटेल मुद्रास्फीति 7.04% है। अमेरिका में इसी दौरान मुख्य मुद्रास्फीति की दर 8.6% रही है। अमेरिका इस पर काबू पाने के लिए इस साल ब्याज दर तीन बार में 1.50% बढ़ा चुका है। लेकिन अपने यहां अब भी सरकार अवाम को दुहने में लगी है। गैस सिलिंडर के दाम पहले से बढ़े हुए हैं। उन्हें थोड़ा घटाना मजबूरी थीऔरऔर भी