दशकों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि मुद्रास्फीति भारत ही नहीं, अमेरिका व यूरोप समेत तमाम विकसित देशों तक के सिर चढ़कर बोल रही है। ऐसे में इन देशों के केंद्रीय बैंकों की पहली प्राथमिकता बन गई है कि सिस्टम में डाले गए नोट वापस खींचो और ब्याज दरें बढ़ा दो। लेकिन इधर खिंचते जा रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने सप्लाई में दिक्कतें पैदा कर दी और महंगाई बढ़ाने का नया आधार बना दिया। अमेरिका नेऔरऔर भी

हम शेयर बाज़ार में रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों की ताकत की बात करते रह सकते हैं। लेकिन बढ़ती मुद्रास्फीति ने उन्हें निचोड़ना शुरू कर दिया। नौकरी और काम-धंधे से होनेवाली आय ठहरी पड़ी है। खर्च बढ़ते जा रहे हैं। वह भी तब, जब अभी तक बढ़ती ब्याज दर का असर ईएमआई पर नहीं पड़ा है. सवाल उठता है कि क्या घर-गृहस्थी चलाने के बढ़े खर्च के अनुरूप आम लोगों की आमदनी भी बढ़ने जा रही है? साफऔरऔर भी

अभी तक शेयर बाजार को रिटेल निवेशकों ने संभाल रखा था। लेकिन क्या रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों का यह सहयोग आगे भी बना रहेगा? हुआ यह था कि साल 2020 के दूसरे हिस्से और पूरे साल 2021 में शुरुआती गिरावट के बाद लोगों की आय कुछ ज्यादा ही तेज़ी से बढ़ गई। ब्याज दरें भी कम थीं तो इससे उपभोक्ता खपत बढ़ गई। कम ब्याज दर की वजह से वाहनों, मकान और बिजनेस तक के लोन परऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की होल्डिंग में एक तिमाही में 6% घट गई है। यह सच वित्तीय सेवाओं की प्रमुख वैश्विक फर्म मॉर्निंगस्टार की एक रिपोर्ट में सामने आया है। दिसंबर 2021 की तिमाही में हमारी लिस्टेड कंपनियों में एफपीआई की शेयरधारिता 654 अरब डॉलर हुआ करती थी। यह मार्च 2022 की तिमाही में घटकर 612 अरब डॉलर रह गई। हालांकि यह साल भर पहले मार्च 2021 की तिमाही के 552 अरब डॉलरऔरऔर भी

गंजेड़ी यार किसके, दम लगाके खिसके। यही हाल अपने यहां विदेशी संस्थागत निवेशकों या एफआईआई का है। वे बीते वित्त वर्ष में भारतीय शेयर बाज़ार से करीब 3 लाख करोड़ रुपए की मुनाफावसूली कर चुके हैं और अब भी बेचे जा रहे हैं। बता दें कि साल 2008 के क्रैश के आसपास एफआईआई ने लगभग इतनी ही रकम निकाली थी और अपना बाज़ार 60% से ज्यादा गिर गया था। इस बार तो निफ्टी-50 अपने शीर्ष से अभीऔरऔर भी