हम आसपास नज़र डालें तो ज्यादातर लोग कृषि या व्यापार में ही लगे हुए हैं। बहुत हुआ तो लोग खेती-किसानी से निकलकर छोटी-मोटी दुकानदारी या ठेला-खोमचा टाइप बिजनेस कर लेते हैं। दिक्कत यह है कि इन सभी क्षेत्रों में कभी इतना वैल्यू एडिशन या मूल्य-वर्धन हो ही नहीं सकता कि वे ज्यादा रोज़गार दे सकें। घर-परिवार के लोगों के साथ दो-चार को काम दे दिया तो बहुत है। सेवा क्षेत्र का केंद्र शहरी इलाके हैं और यहऔरऔर भी

आज़ादी के 78 साल बाद भी भारत कृषिप्रधान देश है तो यह गर्व नहीं, शर्म की बात है। यह भी दुखी होने की बात है कि रोज़गार के लिए कृषि पर निर्भरता घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। 2017-18 में रोज़गार में कृषि का योगदान 44.1% था। यह 2023-24 में 46.1% हो गया। इसके बाद का डेटा सरकार के पास नहीं है। अमेरिका की केवल 1.5% श्रम-शक्ति कृषि में लगी है और वो पूरे देश कीऔरऔर भी

देश में विकास की जो चकाचौंध दिखाई जा रही है, उसमें चमचमाते हवाई अड्डे और हाईवे ज़रूर दिख जाते हैं। लेकिन आए-दिन किसी की छत गिर रही होती तो कई कोई पुल टूट या सड़क धंस रही होती है। 10-11 साल में देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को चमाचम हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा क्यों है कि देश के पास नए संसद भवन के अलावा दिखाने को नया कुछ नहीं है? बड़ा सवाल यह है कि इस विकासऔरऔर भी

विकास के नाम पर कितना भ्रष्टाचार हो रहा है, इसकी खबरें उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र तक फैली हैं। कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश से खबर आई थी कि जल जीवन मिशन योजना में ₹31,300 करोड़ का घोटाला हो गया है। भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जल शक्ति मंत्रालय की ₹2.79 लाख करोड़ की मांग के सामने वित्त मंत्रालय ने केवल ₹1.25 लाख करोड़ देने का फैसला किया है। बिहार में नए-नए पुलोंऔरऔर भी

देश को विकास की चकाचौंध की तरफ दौड़ते एक दशक से ज्यादा हो गए। समय आ गया है कि देखें कि हम किसी मृग मरीचिका में तो फंसकर नहीं रह गए हैं? बढ़ते शेयर बाज़ार और डीमैट खातों को देखकर तो सचमुच लगता है कि विकास हुआ है। लेकिन शेयर बाज़ार तभी बढ़ता है जब वहां लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की तरफ धन का प्रवाह बढ़ जाता है। इस धन का बड़ा हिस्सा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई)औरऔर भी

शेखचिल्ली के बड़े-बड़े दावे। सारे के सारे खोखले, ज़मीन पर फिसड्डी। चाहे वो राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला हो या अर्थव्यवस्था का। मोदी सरकार की 10-11 साल की कुल जमापूंजी यही है। वो समस्याएं सुलझाती नहीं। नई समस्याएं ज़रूर पैदा कर देती है। पिछले दशक में अर्थव्यवस्था में दोहरी बैलेंसशीट की समस्या थी। एक तरफ कॉरपोरेट क्षेत्र पर ऋण का बोझ ज्यादा ही बढ़ गया था। दूसरी तरफ बैंकों के एनपीए या डूबत ऋण काफी बढ़ गए थे।औरऔर भी

यह कहीं इधर-उधर की नहीं, बल्कि खुद भारतीय रिजर्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट में जताई गई चिंता है। भारतीय परिवारों पर चढ़ा ऋण जून 2021 में जीडीपी का 36.6% हुआ करता था। यह दिसंबर 2023 तक 40.2%, मार्च 2024 तक 41% और जून 2024 तक 42.9% पर पहुंच गया। 2015 से 2019 तक हमारे घरों पर चढ़ा ऋण औसतन जीडीपी का 33% हुआ करता था। इससे भी पहले चले जाएं तो वित्त वर्ष 2011-12 के अंत मेंऔरऔर भी

उधार लेना भारतीय संस्कृति, समाज व परम्परा का हिस्सा कभी नहीं रहा, जबकि पश्चिमी देशों में ‘अभी खरीदो, बाद में चुकाओ’ आम जीवन का हिस्सा बन चुका है। इसका प्रमुख कारण यह हो सकता है कि भारत में भावी आय का कोई भरोसा या गारंटी नहीं है, जबकि पश्चिमी देशों में नौकरी गई, तब भी कई महीनों तक ठीकठाक बेरोज़गारी भत्ता मिलता रहता है। लेकिन विडम्बना यह है कि भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े घोषित रक्षक दलऔरऔर भी

देश के मध्यवर्ग के लिए स्वास्थ्य बीमा लेना एक ज़रूरी खर्च है। लेकिन वह इतने दवाब में है कि इस खर्च से भी हाथ खींच रहा है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक मार्च में खत्म हुए वित्त वर्ष 2024-25 में बीमा कंपनियों को मिला कुल स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम केवल 8.98% बढ़ा है, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2023-24 में यह 20.25% बढ़ा था। आर्थिक दबाव से उच्च मध्यवर्ग भी नहीं बचा है। पिछले साल अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीयऔरऔर भी

भारत की अर्थव्यवस्था या जीडीपी आंकड़ों में भले ही बढ़ रहा हो। लेकिन आम भारतीय आज बरबादी की कगार पर खड़ा है। हॉटमेल के संस्थापक और नामी उद्यमी सबीर भाटिया तो कहते हैं कि भारत में जीडीपी ही गलत तरीके से निकाला जाता है। उनका कहना है कि दुनिया में अमेरिका जैसे तमाम देशों में जीडीपी की गणना सीधे-सीधे इस आधार पर की जाती है कि वहां के लोगों ने कितना काम किया और उस काम काऔरऔर भी