महीने का आखिरी गुरुवार। डेरिवेटिव सौदों के सेटलमेंट का दिन। यह भारतीय शेयर बाज़ार में ऑपरेटरों का दिन होता है। वे घात लगाकर शिकार करते हैं। शिकार एकदम नज़दीक आ जाए। उसे कोई खटका न लगे। जब वो पूरी तरह निश्चिंत हो जाए तो हमला करके उसे चिंदी-चिंदी कर दो। सालों-साल से यही होता आया है। कल भी यही हुआ। बाज़ार बंद होने के 45 मिनट पहले खेल शुरू हुआ और देखते ही देखते सारा सीन बदलऔरऔर भी

धीरे-धीरे यह सेवा लेनेवालों की संख्या बढ़ रही है तो हल्की-सी घबराहट के साथ जिम्मेदारी और जवाबदेही का भाव भी बढ़ता जा रहा है। जब लोग आप पर भरोसा करने लगे तो उनके प्रति आपकी जवाबदेही बढ़ जाती है। अपनी तरफ से सच्ची सेवा देने का संकल्प है। लेकिन एक बात गांठ बांध लें कि मैं या कोई दूसरा आपको पैसे बनाकर नहीं देगा। पैसे के मामले में किसी की नहीं, सिर्फ अपनी सुनें। अब टिप्स आजऔरऔर भी

कल एक प्रोफेशनल ट्रेडर से मिला। उनका कहना था कि पिछले छह सालों के सफल करिअर में उनका औसत स्ट्राइक रेट 55-65% तक रहा है। यह अपने-आप में एक मानक है। लेकिन वे हर सौदे में 3% कमाने की गुंजाइश और 1% ही गंवाने की गुंजाइश लेकर चलते हैं। अगर महीने के दस सौदों में से पांच गलत और पांच सही निकले तो उनका घाटा 5% होता है, जबकि फायदा 15% होता है। अब देखें आज काऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हर खरीदनेवाले के सामने एक बेचनेवाला होता है। तभी सौदा होता है, लिक्विडिटी आती है। पहला सोचता है कि आगे बढ़ेगा तो अभी खरीद लो। दूसरा सोचता है कि आगे गिरेगा तो अभी बेच डालो। हेड या टेल। उछालने पर दो में से एक ही आएगा। प्रायिकता 50-50% है तो क्या ट्रेडिंग सिक्का उछालने जैसा खेल है? नहीं। यह इंसानी अपेक्षाओं का खेल है। प्रायिकता 75-25% भी हो सकती है। देखते हैं आज काऔरऔर भी

लंबे दौर में अच्छे-बुरे का लॉजिक जरूर चलता होगा, लेकिन छोटे समय में शेयर बाज़ार में केवल एक लॉजिक चलता है। वो यह कि डिमांड ज्यादा है कि सप्लाई। इसी के जुड़ा है कि लालच ज्यादा है कि डर। अगर डिमांड या लालच का पलड़ा भारी है तो शेयर के भाव बढ़ेंगे। अगर डर के चलते लोग निकल रहे हैं और सप्लाई ज्यादा है तो शेयर के भाव गिरेंगे। समझदार ट्रेडर इसी नापतौल के बाद दांव चलतेऔरऔर भी

इंसान की फितरत है कि वो हमेशा सही होना चाहता है। गलत होने से घनघोर घृणा करता है। लेकिन यह फितरत ट्रेडिंग और निवेश की दुनिया में नहीं चलती। यहां का अकाट्य सत्य है कि नुकसान हर किसी को उठाना पड़ेगा। चार ही बातें हो सकती हैं: बड़ा लाभ, छोटा लाभ, बड़ा नुकसान, छोटा नुकसान। इसमें हमें बस बड़े नुकसान से बचने का तरीका खोजना है। बाकी तो वक्त का फेरा है। उतरते हैं आज के मैदानऔरऔर भी

कुछ लोग फाइनेंस को जमकर गरियाते हैं। कहते हैं कि यह तो बैठे-ठाले दूसरों की जेब ढीली करने का धंधा है, जबकि है यह उद्यमियों की प्रतिभा व मेहनत से हासिल कमाई में हिस्सेदारी का ज़रिया। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग भी खुद को खोजने जैसी यात्रा है। जोखिम से नहीं डरते; कूदकर फलों को लपकने में मज़ा आता है; अध्ययन, अनुशासन व मेहनत का मन है तो कामयाब होंगे। कल की हिट टिप्स के बाद बात आजऔरऔर भी

लोकतंत्र में कोई भी नीति संबंधी मानक आमजन के लिए अप्रासंगिक नहीं होना चाहिए। अगर वो अप्रसांगिक है तो तय मानिए कि उस लोकतंत्र से लोगों को सायास बाहर रखा गया है। मुद्रास्फीति के कल आए आंकड़े ने यही साबित किया है। सरकार, वित्त मंत्री, उसके संत्री तक चहक रहे हैं कि मार्च में मुद्रास्फीति घटकर 6% से नीचे आ गई है। हम-आप पूछ रहे हैं कि अच्छा! घट गई? कब कैसे? शेयर बाज़ार ने ऐसा नहींऔरऔर भी

जबरदस्त शोर है। अखबारों में, नेट पर, चैनलों पर, समूचे मीडिया में। राजनीति में, समाज में। यहां तक कि मन में। इस शोर के बीच सच को पकड़ना है। जैसे, भारत-यूरोप व्यापार वार्ता में यूरोप चाहता है कि भारत वाइन व कारों का आयात सस्ता कर दे। भारत चाहता है कि यूरोप भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए रास्ता सुगम कर दे। हम भोग में डूबें और अपनी प्रतिभाएं उन्हें दे दें! ये कैसा व्यापार!! देखते हैं आज काऔरऔर भी

हम अक्सर प्रचलित मान्यताओं और प्रचार के शिकार हो जाते हैं। सच है कि जनधन का हर लुटेरा गलत है, चाहे वो राजनीतिक हो या चोर-डकैत। इस लूटे गए धन पर वह टैक्स देगा तो फंस जाएगा। ऐसी काली कमाई से निकला काला धन गलत है। लेकिन मान लीजिए कि हम फालतू झंझट से बचने से लिए अपनी मेहनत की कमाई पर टैक्स नहीं देते तो वह काला धन कैसे हो गया? कोई इलाका सरकार से बगावतऔरऔर भी