भारत के सामने अब मुद्रास्फीति को थामना नहीं, बल्कि आर्थिक विकास दर को बढ़ाना बड़ी चुनौती है। रिटेल मुद्रास्फीति की दर नवंबर में 5.88% थी। यह दिसंबर में और घटकर 5.72% हो गई है। यह काफी सुखद संकेत है। लेकिन दुखद बात यह है कि देश में औद्योगिक निवेश नहीं बढ रहा। वह भी तब, जब मोदी सरकार जब देश के भौतिक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार बेहतर बनाने के साथ ही उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई)औरऔर भी

विषम और विकट स्थितियों में सामान्य नियम काम नहीं करते। मसलन, किसी देश का मुद्रा अगर अगर डॉलर व यूरो के मुकाबले कमज़ोर होती है तो माना जाता है कि उस देश का निर्यात बढ़ जाएगा क्योंकि उसका माल इन देशों में डॉलर में सस्ता हो जाएगा। इधर कुछ महीनों भारतीय रुपया डॉलर और यूरो दोनों के ही खिलाफ काफी कमज़ोर हुआ है। डॉलर पहले 75 रुपए का हुआ करता था, अब 82 रुपए का मिल रहाऔरऔर भी

कंपनी का अतीत देखा-परखा जा सकता है। तमाम टूल्स व फॉर्मूले भी हैं जिनसे उसका भविष्य आंका जा सकता है। यह काम कोई दूसरा आपके लिए कर सकता है। लेकिन तीन पहलू ऐसे हैं जिन्हें निवेश करने से पहले खुद आपको समझना पड़ता है। पहला यह कि कंपनी का बिजनेस मॉडल क्या है और उसमें विकास की कितनी गुंजाइश है? दूसरा यह कि उसका प्रबंधन कैसा है? प्रबंधन का काबिल होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि यह भीऔरऔर भी

रिजर्व बैंक का कहना है कि इस समय भारत जैसे उभरते बाजारों की संभावनाओं की तुलना में गहराते वैश्विक आर्थिक हालात का खतरा ज्यादा है। बढ़ती ब्याज दरों से अर्थव्यवस्था में सबसे लिए उधार लेना मंहगा हो गया है। इससे उपभोक्ता और निवेश, दोनों की ही मांग पर नकारात्मक असर पड़ा है। इससे आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड़ सकती हैं। अमेरिका में इसका साफ असर देखा जा रहा है। वहां के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने 2023 मेंऔरऔर भी

भारत के पास अपना खुद का विशाल बाज़ार है। साथ ही हमारी 65% आबादी की उम्र 35 साल से कम है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को तेज़ी से फलने-फूलने के लिए किसी बाहरी सहारे की ज़रूरत नहीं। लेकिन यह भी सच है कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों या साफ कहें तो कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर हैं जिसमें हमारे जीडीपी का तकरीबन 4% भाग चला जाता है। हमारी अर्थव्यवस्था में कुल निर्यात का हिस्सा तीनऔरऔर भी

यकीनन, भारत अन्य देशों से अभी बेहतर स्थिति में है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष 2022-23 में हमारी अर्थव्यवस्था 7% बढ़ेगी। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने अपना अनुमान 7.4% से घटाकर 6.8% कर दिया है। वहीं, विश्व बैंक ने अपना अनुमान 6.5% से बढ़ाकर 6.9% कर दिया है। इससे पहले अपना रिजर्व बैंक अप्रैल में कह रहा था कि हमारा जीडीपी इस साल 7.2% बढ़ेगा। लेकिन उसने दिसंबर तक यह अनुमानऔरऔर भी

केंद्र सरकार की मूल घोषणा के मुताबिक भारत के जीडीपी को मार्च 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाना था। अभी डेढ़ महीने पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने ललकारा कि भारत 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा और 2027 तक दुनिया की तीसरे सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा। किसी ने उनसे पूछा नहीं जो अर्थव्यवस्था 2022-23 में अंत में 1.92 ट्रिलियन डॉलर की होगी, वो दो ही साल बाद 2024-25 के अंतऔरऔर भी

भारत की अर्थव्यवस्था का आकार अभी कितना है? सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक हमारा जीडीपी मार्च 2022 के अंत में 147.36 लाख करोड़ रुपए का था। यह 7% बढ़कर मार्च 2023 तक 157.60 लाख करोड़ रुपए हो जाने का पहला अनुमान है। मौजूदा विनिमय दर पर डॉलर में यह रकम 1.79 ट्रिलियन डॉलर और 1.92 ट्रिलियन डॉलर की निकलती है। आखिर उस सपने का क्या हुआ जो केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2018 में दिखाया था किऔरऔर भी

बड़े व नामी निवेशक छोटी-छोटी कंपनियों को पकड़ते हैं। जैसे, आकाश कचोलिया देश के सफलतम निवेशकों में गिने जाते हैं। उन्हें मल्टी-बैगर यानी कई गुना बढ़नेवाले स्टॉक्स को पकड़ने का महारथी माना जाता है। उन्होंने शेयर बाज़ार में निवेश से करीब 1700 करोड़ रुपए की दौलत बनाई है। उनके निवेश पोर्टफोलियो की पांच शीर्ष कंपनियां हैं – सफारी इंडस्ट्रीज़, शैली इंजीनियरिंग प्लास्टिक्स, एनआईआईटी, फिलिप्स कार्बन ब्लैंक और रेनबो चिल्ड्रेन्स मेडिकेयर। इनमें से सफारी और एनआईआईटी के अलावाऔरऔर भी

अमेरिका में आर्थिक मंदी की आशंका। चीन की आर्थिक विकास दर 2.7% रह जाने का अनुमान। साथ ही समूची विश्व अर्थव्यवस्था बहुत बढ़ी तो 2023 में 2.7% बढ़ सकती है। ऐसे में भारत इस साल 2022-23 में 6.9% और नए साल 2023-24 में 5-6% भी बढ़ जाए तो दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगा। ऐसे में हम भारतीय बड़े आराम से गाल फुलाकर हनुमान बनने के सरकारी स्वांग के झांसे में आ सकतेऔरऔर भी