अर्थव्यवस्था डूब रही है या दौड़ रही है, इसको लेकर सरकार व अर्थशास्त्रियों की राय विपरीत है। लेकिन इसको लेकर कोई मतभेद नहीं कि सरकार ने नौ सालों में टैक्स-संग्रह बढ़ाने में शानदार सफलता हासिल की है। वित्त वर्ष 2013-14 से 2022-23 तक के नौ साल में केंद्र सरकार का प्रत्यक्ष टैक्स-संग्रह 173% बढ़ा है। अप्रत्यक्ष टैक्स में जीएसटी का संग्रह हर महीने नया रिकॉर्ड बनाता रहता है। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम घटने के बावजूद सरकारऔरऔर भी

अगर यह सच है कि हमारी अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है और दुनिया मंदी के दलदल में धंसने जा रही है तो हमारे लोग इतनी बड़ी तादाद में भारतीय नागरिकता छोड़कर विदेश क्यों भागते जा रहे हैं? खुद विदेश मंत्री एस. जयशंकर से संसद में जानकारी दी है कि पिछले 11 सालों में 16 लाख भारतीय अपनी नागरिकता छोड़कर विदेश में जा बसे। बीते साल 2022 में यह संख्या सबसे ज्यादा 2,25,620 रही है।औरऔर भी

शीर्ष रेटिंग व रिसर्च एजेंसी क्रिसिल का आकलन है कि इस साल हमारा निर्यात बहुत हुआ तो 2-4% ही बढ़ सकता है क्योंकि हमारे निर्यात के दो सबसे ठिकानों – अमेरिका व यूरोप की विकास दर क्रमशः 2% से घटकर 1.4% और 3.5% से घटकर 0.7% रह जाने का अंदेशा है। ऐसे में हमारी अर्थव्यवस्था कैसे ज्यादा बढ़ सकती है? बीते वित्त वर्ष 2022-23 की विकास दर का अगला अनुमान 31 मई को आना है। यह दरऔरऔर भी

आर्थिक विकास अगर प्रतिबद्धता के बजाय चुनाव जीतने का राजनीतिक नारा बन जाए तो देश के सामने कभी सच्ची तस्वीर नहीं आती और उसकी अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क होना तय हो जाता है। कहा जा रहा है कि हम बहुत तेज़ी से विकास कर रहे हैं। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि देश का वस्तु निर्यात लगातार पांच महीनों से घटता जा रहा है। दिसंबर 2022 में यह 3.1% घटा था। उसके बाद इस साल जनवरीऔरऔर भी

बहुत सोच-समझकर, आग-पीछा देखकर कंपनी चुनकर उसके शेयर खरीदे। फिर भी उसका शेयर बढ़ने के बजाय घाटा दे सकता है। यह शेयर बाजार का रिस्क है जिससे कोई नहीं बच सकता। इसलिए निवेशकों को एक नहीं, कई तरह की कंपनियों में निवेश करने को कहा जाता है। फिर भी कुछ ज़रूरी पहलू है जिन्हें हमें निवेश से पहले हर कंपनी में देख लेना चाहिए। पहला, कंपनी कहीं ऋण के बोझ तले दबी तो नहीं है। उसका ऋण-इक्विटीऔरऔर भी

श्रम बाज़ार में स्नातकों की बढ़ती शिरकत यकीनन शुभ संकेत है। लेकिन देश की श्रमशक्ति में उनका हिस्सा अब भी काफी संकुचित है। कोरोना से आने से पहले सितंबर-दिसंबर 2019 में यह हिस्सा 13.2% हुआ करता था। कोरोना के दौरान जनवरी-अप्रैल 2020 में थोड़ा-सा बढ़कर 13.7% हो गया। लेकिन सितंबर-दिसंबर 2020 में घटकर 11.7% पर आ गया। लेकिन उसके बाद भी 12% के आसपास ठहरा हुआ है, जबकि श्रम बाज़ार में उनीक भागीदारी बढ़ गई है। इसकीऔरऔर भी

अच्छी बात यह है कि अपने यहां ग्रेजुएट युवक-युवतियां थक-हारकर घर बैठ जाने के बजाय नौकरी मांगने के लिए श्रम बाज़ार में पहले से ज्यादा उतरने लगे हैं। हालांकि आमतौर पर काम मांगनेवाले श्रमिकों का श्रम बाज़ार में आना घटा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में श्रम भागीदारी की दर (एलपीआर) वित्त वर्ष 2016-17 में 46.2% हुआ करती है। यह बीते वित्त वर्ष 2022-23 में घटकर 39.5% पर आ गई है। लेकिन बेरोज़गारी की ऊंची दरऔरऔर भी

जो जितना ज्यादा पढ़-लिख लेता है, उसे देश के भीतर काम मिलना उतना ही मुश्किल हो जाता है। इसकी तस्दीक करते हैं बेरोज़गारी के आंकड़े। सीएमआईई के मुताबिक, भारत में बेरोज़गारी की औसत दर 7.5% चल रही है। लेकिन अगर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट व इंजीनियरों वगैरह की बेरोजगारी को अलग से गिनें तो उनका आंकड़ा 17.2% निकलता है। यूं तो जिनकी अधिकतम पढ़ाई 10वीं से 12वीं तक हुई है, उनमें भी ज्यादा बेरोज़गारी है, फिर भी उनकीऔरऔर भी

हमारा पूंजी बाज़ार बम-बम कर रहा है। एनएसई दुनिया में पहले नंबर का डेरिवेटिव्स एक्सचेंज बन चुका है। लेकिन जिस श्रम की बूंद-बूंद से पूंजी बनती है, उसी श्रम बाज़ार की हालत खस्ता है। इसमें कम पढ़े-लिखे लोगों को काम मिल जाता है। लेकिन उच्च शिक्षा की अवहेलना होती है। हुआ यह कि अपने यहां 1990 के दशक के उत्तरार्ध में उच्च शिक्षा जमकर बढ़ी। इंजीनियरिंग कॉलेज खूब खुले ताकि आईटी इंजीनियरों की मांग पूरी की जाऔरऔर भी

शेयर का भाव देखकर नहीं पता चलता कि वह सस्ता है या महंगा। 5 रुपए का भी कोई शेयर महंगा हो सकता है और 5000 रुपए का शेयर भी सस्ता। शेयर महंगा है या सस्ता, इसका सबसे प्रचलित पैमाना है पी/ई अनुपात, मतलब शेयर का भाव कंपनी के प्रति शेयर लाभ (ईपीएस) से कितना गुना चल रहा है या बाज़ार कंपनी के प्रति शेयर एक रुपए के लाभ के लिए कितना दाम देने को तैयार है। दूसराऔरऔर भी