इनकम टैक्स भले ही प्रत्यक्ष टैक्स हो। लेकिन इसे साल में ₹2.5 लाख से ज्यादा कमानेवाला हर देशवासी देता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हमारी प्रति व्यक्ति आय वित्त वर्ष 2022-23 में ₹99,404 तक पहुंची थी और अब ताज़ा अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में ₹1,06,134 रह सकती है। इसके ढाई गुना से ज्यादा कमाकर इनकम टैक्स देने वालों की संख्या 7.78 करोड़ हो चुकी है, जिसमें से 7.65 करोड़ बाकायदा टैक्स रिटर्न दाखिल करते हैं।औरऔर भी

भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन हमारा शेयर बाज़ार महीना भर पहले हांगकांग को पीछे छोड़कर दुनिया का चौथा बड़ा शेयर बाजार बन गया। अब अमेरिका, चीन व जापान के शेयर बाज़ार ही हम से ऊपर हैं। तीन दिन पहले 7 मार्च को तो निफ्टी-50 और बीएसई सेंसेक्स नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए। अब सभी को डर सताने लगा है कि यहां से बाज़ार कहीं खटाक से गिर गया तो? आखिर चीन काऔरऔर भी

सगाई पिछले साल जनवरी में। शादी इस साल जुलाई में। लेकिन इसके बीच तीन दिन के शादी-पूर्व धूम-धड़ाके पर ₹1500 करोड़ से ज्यादा उड़ा डाले। यह अनंत विलास कथा उस भारत में हो रही है जहां 81.35 करोड़ लोग प्रतिमाह 5 किलो मुफ्त राशन के मोहताज़ हैं, जहां पिछले दस साल में अरबों डॉलर की दौलत रखनेवाले अमीरों की संख्या 11 गुना बढ़ गई और जहां 21 खरबपतियों के पास 70 करोड़ भारतीयों की कुल दौलत सेऔरऔर भी

चुनावी लोकतंत्र की सारी राजनीति परसेप्शन या माहौल बनाने पर चलती है। रोज़ी-रोटी चलाने के बोझ से दबे करोड़ों मतदाताओं के पास फुरसत नहीं कि राजनीतिक पार्टियों की कथनी और करनी के मर्म को समझकर वोट डालें। उनकी याददाश्त छोटी होती है और वे माहौल के हिसाब से बहते व वोट देते हैं। शेयर बाज़ार का भी यही हाल है। राजनीति व शेयर बाज़ार, दोनों ही जगहों पर छोटे समय में सत्य नहीं चलता। भाव या सत्ताऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीसरी बार सत्ता में वापसी का इतना विश्वास है कि कैबिनेट बैठक में नई सरकार के पहले 100 दिनों का एक्शन-प्लान तय कर डाला। बैठक में प्रमुख मंत्रालयों के सचिवों ने बाकायदा प्रजेंटेशन रखा कि 2047 में विकसित भारत के विज़न के लिए अगले पांच सालों में क्या-क्या किया जा सकता है। इसमें गरीबी का खात्मा, हर युवा को हुनरमंद बनाना और कल्याण योजनाओं को पूर्णाहुति तक पहुंचाना शामिल है। वैसे यह कवायतऔरऔर भी

जब सरकार बेईमान हो तो जनता की ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वो बेहद ईमानदारी से सच का पता लगाती रहे। नहीं तो देश को रसातल में डूबते देर नहीं लगती। बीते हफ्ते गुरुवार, 29 फरवरी को सरकारी आंकड़ा आया कि चालू वित्त वर्ष 2023-24 की तीसरी यानी अक्टूबर-दिसंबर 2023 की तिमाही में देश का जीडीपी 8.4% बढ़ गया है। हर किसी का अनुमान था कि बहुत हुआ तो इस दौरान जीडीपी 6.5% ही बढ़ेगा। लेकिन बढ़औरऔर भी

देश के 90% से ज्यादा लोगों की महीने की आमदनी ₹25,000 से कम है। समझना मुश्किल नहीं कि इसमें से कितने में वे घर-परिवार चलाते होंगे, कितना हारी-बीमारी जैसे आकस्मिक खर्च पर जाता होगा और इसके बाद वे कितना बचा पाते होंगे। डेटा बताता है कि अप्रैल 2020 से मार्च 2023 तक भारतीय घरों की कुल वित्तीय बचत ₹86.2 लाख करोड़ रही है। इसमें से ₹31.6 लाख करोड़ बैंक व अन्य संस्थाओ के एफडी, ₹49.5 लाख करोड़औरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी खासियत है कि जिस बात पर उनको घेरा जा सकता है, उसे ही वे अपना मुख्य प्रचार बना लेते हैं। 2014 से अब तक उन्होंने जो कहा, वो किया ही नहीं। अच्छे दिन नहीं आए, विदेश गया कालाधन नहीं आया, हर देशवासी के खाते में 15 लाख रुपए नहीं आए, हर साल दो करोड़ नौजवानों को रोज़गार नहीं मिला, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई, नोटबंदी से न कालाधनऔरऔर भी

मोदी सरकार भ्रष्टाचार को सदाचार में कैसे बनाती रही है, इसकी सटीक मिसाल है चुनावी बांड। जिसे जनता जनार्दन कहा जाता है, उसे पता ही नहीं कि किस देशी-विदेशी कंपनी ने किस राजनीतिक पार्टी को कितना चंदा दे दिया। बस, देनेवाला जानता है किसको दिया और पानेवाला जानता है कि किसने दिया। डील हो गई। डंके की चोट पर कॉरपोरेट रिश्वतखोरी को चुनावी फंडिंग का वैधानिक हिस्सा बना दिया गया। लेकिन सरकार ने कहा कि चुनावी बांडऔरऔर भी

प्रगति कभी हवा में नहीं होती। विकास हमेशा निरंतरता में होता है। यह कहना सफेद झूठ, सरासर धोखा और फरेब है कि मई 2014 से पहले देश में कुछ हुआ ही नहीं और सब कुछ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही हुआ। जिन जनधन खातों, आधार और मोबाइल (जेएएम या जैम) को मोदी सरकार अपनी सफलता का मूलाधार बताती है, इन सभी की नींव मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के शासन में रखीऔरऔर भी