बाजार में पहले से छाए पस्ती के आलम को और हवा तब मिल गई, जब अमेरिकी ऋण संकट के समाधान के बावजूद एशिया के बाजार गिर गए। मंदड़ियों का खेमा मान बैठा है कि अमेरिका में हुआ राजनीतिक समझौता तात्कालिक समाधान है। इसलिए इस पर चहकने की कोई जरूरत नहीं है। बाजार फिर से 5500 के नीचे चला गया तो उन्होंने फिर से बिक्री का बटन दबा दिया है। फिर वही बात उठा ली है कि अबऔरऔर भी

तीन साल पुराने लेहमान ब्रदर्स के प्रेत ने हमारे निवेशकों व ट्रेडरों के मन को अभी तक अवांछित नकारात्मकता से भर रखा है। अमेरिका के ऋण संकट को यहां इतनी संजीदगी से देखा जा रहा था जैसे भारत व एशिया के निवेशकों ने ही अमेरिका को सारा उधार दे रखा हो और कोई भी संभावित डिफॉल्ट उनका धन स्वाहा कर देगा। यह निराशावाद की इंतिहा है और मेरी राय में अगर कोई निवेशक जोखिम नहीं उठा सकताऔरऔर भी

निफ्टी और सेंसेक्स दोनों लगभग सपाट। लेकिन बाजार में छाई निराशा का कोई अंत नहीं है। ट्रेडर हलकान हैं। निवेशक अपनी गाढ़ी कमाई को लेकर परेशान हैं। वे तमाम ऐसी कंपनियों में कसकर फंस चुके हैं, जिनके शेयर अच्छे फंडामेंटल्स के बावजूद उनकी खरीद के भाव से नीचे ही नीचे चल रहे हैं। दरअसल, बाजार अपना मूल चरित्र खो चुका है और उस पर सट्टेबाजी और जोड़तोड़ हावी हो गई है। हालत यह है कि आज बोगसऔरऔर भी

अमेरिका के ऋण-संकट ने पूरी दुनिया के बाजारों की हालत पटरा कर दी है तो भारतीय बाजार कैसे सलामत बच सकता था। निफ्टी एक फीसदी से ज्यादा गिरकर 5500 के नीचे पहुंच गया। फिर भी मुझे लगता है कि अपने यहां असली तकलीफ रोल्स की है। चूंकि यह फिजिकल सेटलमेंट है नहीं, तो ट्रेडरों के पास कैश का अंतर भरने के अलावा कोई चारा नहीं है। यह हमारे बाजार में आई तीखी गिरावट का मूल कारण हैऔरऔर भी

बाजार में भारी-भरकम शॉर्ट सौदों की भरमार है। लेकिन बाजार का मूल रुझान अब भी नहीं बदला और वह अब भी तेजड़ियों के हाथ में है। कल की तीखी गिरावट यकीनन अचानक सन्न रह जाने की प्रतिक्रिया थी। ठीक एक्सपायरी के पहले ऐसे झटके की उम्मीद कहीं से भी नहीं थी। वैसे, बाजार को जैसे करेक्शन की दरकार थी, यह उस कड़ी का आखिरी करेक्शन था। अब सितंबर में ब्याज दर में किसी वृद्धि की उम्मीद नहींऔरऔर भी

बाजार को मनचाहे अंदाज में नचानेवालों के लिए आज से बेहतर कोई दूसरा दिन हो नहीं सकता था। ब्याज दर में ज्यादा से ज्यादा 0.25 फीसदी वृद्धि की अपेक्षा थी। लेकिन असल में यह निकली 0.50 फीसदी। इसे रोलओवर के पहले बाजार को तगड़ा झटका देने के इस्तेमाल किया गया। हालांकि बाजार ने पिछले दो हफ्तों में हासिल सारी बढ़त एक झटके में खो दी है। लेकिन निश्चित तौर पर बाजार की अंतर्धारा नहीं बदली है। केवलऔरऔर भी

असली मायने-मतलब भरोसे का होता है। टेक्निकल एनालिस्ट बाधाएं खड़ी करते हैं क्योंकि इनका काम ही यही है। इंसानों का काम है उनके प्रतिरोध व बाधाओं को तोड़ देना। निफ्टी में 5660 प्रतिरोध का बहुत ही मजबूत स्तर था और किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह स्तर टूट जाएगा और वो भी रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की त्रैमासिक समीक्षा से ठीक पहले, खासकर तब, जब बाजार कमजोरी के साथ गिरकर खुला था। लेकिन दोऔरऔर भी

मंदी का बाजार हमेशा मरे हुए स्टॉक्स में भी जान देता है और तेजी के बाजार से भी ज्यादा तेजी का सबब बन जाता है क्योंकि ऑपरेटर व फंड नहीं जानते कि बाजार का रुख कब पलट जाए तो हमेशा हड़बड़ी में रहते हैं। दूसरी तरफ तेजी का बाजार आपको हमेशा एक धीमा पैटर्न देता है जो अंडमान-निकोबार की यात्रा जैसा बोरिंग होता है क्योंकि यहां निवेशक नोट बनाने की हड़बड़ी में होते हैं, जबकि ऑपरेटरों वऔरऔर भी

बाजार के लिए आज का दिन बिना किसी वजह के बड़ा ढीलाढाला रहा। न तो वह 5540 का समर्थन स्तर तोड़कर बहुत नीचे गया और न ही वैसी बढ़त ली जिसका मुझे इंतजार था। खुला थोड़ा दबकर 5554.60 पर। फिर बढ़कर दस बजे से पहले ही 5578.90 तक चला गया। इसके बाद शाम तीन बजे तक 5532.70 पर आ जाने के बाद 0.46 फीसदी की गिरावट के साथ 5541.60 पर बंद हुआ। बहुत से एनालिस्ट अब भीऔरऔर भी

बाजार खुलते ही निफ्टी 5645 तक चला गया। लेकिन बड़ी साफ वजहों से खुद को इस स्तर पर टिकाए नहीं रख सका और धड़ाधड़ 5555 तक गिर गया। बंद हुआ है 0.83 फीसदी की गिरावट के साथ 5567.05 पर। ट्रेडर भौचक और भ्रमित हैं। उनका वही पुराना सवाल है कि बाजार इस तरह आखिर गिरा क्यों? तो प्यारे! यह रोलओवर की पुरानी तकलीफ है। इस डेरिवेटिव सेटलमेंट की एक्सपायरी में सिर्फ सात दिन बचे हैं। इस बीचऔरऔर भी