अपने यहां विचित्र स्थिति है। महीने भर पहले रिजर्व बैंक ने दस साल के सरकारी बांडों की नई सीरीज़ जारी की है, जिस पर सालाना ब्याज की दर 6.10% है। इन बांडों को ब्याज दरों का बेंचमार्क माना जाता है। इससे पहले की सीरीज़ में इन बांडों पर सालाना 5.85% ब्याज दिया जाता था। जाहिर है कि जब नए बांड पर 0.25% ज्यादा ब्याज मिलेगा तो पुराने बांडों की यील्ड भी बढ़कर उसके समतुल्य हो जानी चाहिए।औरऔर भी

देश में चल रही मुद्रास्फीति से जुड़ी होती है प्रचलित ब्याज की दर। धन की लागत या ब्याज दर से मुद्रास्फीति के असर को सम किया जाता है। नहीं तो ब्याज की वास्तविक दर निकालनी पड़ती है। इसे अमूमन धनात्मक होना चाहिए। यह अलग बात है कि आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए दुनिया के पांच देशों ने ब्याज की दर ही शून्य या ऋणात्मक रखी है तो वास्तविक ब्याज दर की बात करना ही निरर्थक है।औरऔर भी

किसी देश या अर्थव्यवस्था में नीतिगत ब्याज दर क्या है, सरकारी बांडों पर ब्याज की वर्तमान दर क्या है, बैंक कितने ब्याज पर उद्योग जगत को उधार देते हैं और रिटेल व थोक मुद्रास्फीति क्या चल रही है, इनका बड़ा गहरा रिश्ता शेयर बाज़ार समेत कमोडिटी व फॉरेक्स बाज़ार तक से होता है। इनसे देशी मुद्रा की विनिमय दर भी जुड़ी है। इसलिए बाज़ार में कितने डॉलर आएंगे, इससे भी इनका वास्ता होता है तो विदेशी बाजारऔरऔर भी

इतिहास के डिग्रीधारी शक्तिकांत दास 11 दिसंबर 2018 को जब से भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बने हैं, तब से उन्होंने दो खास काम कर डाले। एक, उन्होंने रिजर्व बैंक की स्वायत्तता खत्म तक उसे केंद्र सरकार का दास बना दिया। दो, पहले मौद्रिक नीति अमूमन मंगलवार को आती थी, अब शुक्रवार को आने लगी है। उन्हें मौद्रिक नीति को संभालना कितना आता है, इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं कि सात बार से उन्होंने ब्याजऔरऔर भी

ट्रेडर का दिमाग जितना शांत व खुला रहेगा, वह उतना ही बारीकी से सामनेवालों के स्वभाव व बर्ताव का पैटर्न देख पाएगा। किस तरह के ट्रेडर सुबह भाव खोलते हैं और कौन-से ट्रेडर शाम को बंद करते हैं, बीच में दोपहर के समय लंच के दौरान कैसे ट्रेडर चांदी काटते हैं, डे-ट्रेडरों की क्या भूमिका है, देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों की क्या सक्रियता है – ऐसे बहुतेरे तथ्यों पर हमें पैनी नज़र रखनी होती है। देखना पड़ता हैऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग लाखों लोगों का खेल है। इसलिए इसमें धूर्तता या चालाकियां नहीं चलती। यह दरअसल दिमागदार योद्धाओं का दैनिक संग्राम है। यहां सबसे तेज़ कंप्यूटर, सबसे तेज़ इंटरनेट कनेक्शन या सबसे तेज़ी से रिफ्रेश होनेवाले ब्रोकर टर्मिनल से कमाई नहीं होती। यहां ट्रेडर की कमाई इस बात से होती है कि वह कितनी ज्यादा से ज्यादा काम की सूचनाओं की कितनी तेज़ी से प्रोसेस कर न्यूनतम रिस्क में अधिकतम लाभ के ट्रेड में घुसताऔरऔर भी

कभी सुनी-सुनाई या बताई बातों पर मत जाइए। वॉट्सअप संदेश और सोशल मीडिया पर कतई यकीन न करें क्योंकि वहां निहित स्वार्थी तत्व अफवाहें व झूठी खबरे ही फैलाते हैं। देखिए कि आपका ट्रेडिंग टर्मिनल क्या कह रहा है। ट्रेडिंग टर्मिनल कभी झूठ नहीं बोलता, न बोल सकता है। लम्बे समय का निवेश यकीनन कंपनी की ताकत, प्रतिस्पर्धा की स्थिति और उसके बिजनेस की संभावना जानने की मांग करता है। लेकिन छोटे समय की ट्रेडिंग में मानवऔरऔर भी

हमें बाज़ार का हर भेद समझने की कोशिश में लगे रहना चाहिए। बाज़ार बढ़ा है, यह तथ्य तो सबकी आंखों के सामने है। लेकिन वह नई खरीद के दम पर बढ़ा है या पहले बेचे गए शेयरों की खरीद (शॉर्ट कवरिंग) की मजबूरी के चलते, यह हकीकत सभी को पता नहीं होती। वोल्यूम बढ़ने के साथ शेयर के भाव गिर रहे हों तो साफ है कि शॉर्ट कवरिंग चल रही है। कम वोल्यूम में शेयर चढ़ रहाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार तर्क पर नहीं, भावनाओं व संभावनाओं पर चलता है। जिसे हम तर्क समझते हैं, उसका असर तो बाज़ार चुटकियों में जज़्ब कर चुका होता है। हम उसे अपनाएं, तब तक वह उस्तादों की उंगलियों से गुजरकर टखने तक पहुंच चुका होता। लंबे समय बाद बनी लम्बी ग्रीन कैंडल देखर हमें लगता है कि अब तो खरीद आएगी और शेयर पक्का बढ़ेगा। लेकिन अगले ही दिन वह धसक जाता है। वैसे, तर्क का तथ्य अगर बाज़ारऔरऔर भी

ज़ोमैटो को पिछले तीन साल से लगातार करोड़ों का घाटा हो रहा है। लेकिन 15 दिन पहले उसका आईपीओ 76 रुपए पर आया तो 38.25 गुना सब्सक्राइब हुआ। लिस्टिंग लगभग 182% ऊपर 138 रुपए पर हुई और अब भी ज्यादा टूटा नहीं है। लेकिन दुनिया के स्तर पर देखें तो फूड डिलीवरी से लेकर जगह किराए पर देने या टैक्सी सेवा देनेवाली कंपनियों ने लिस्टिंग पर भले ही कमाल दिखाया हो, बाद में चमक फीकी पड़ गई।औरऔर भी