रिस्क को कैसे समझें और कैसे उसे न्यूनतम करें? यह निवेश और ट्रेड करनेवालों के लिए पहली और सबसे बड़ी चुनौती है। इससे निपट लेने के बाद दूसरी चुनौती यह आती है कि न्यूनतमं रिस्क उठाते हुए शेयर बाज़ार से अधिकतम रिटर्न कैसे हासिल करें? सबसे पहले, पहली चुनौती। रिस्क शेयर बाज़ार के सौदों मे नहीं होता, बल्कि इसमें जो लोग भाग ले रहे हैं उनके बर्ताव, उनके व्यवहार, उनके स्वभाव में होता है। माइक्रोस्कोप लेकर भीऔरऔर भी

तमाम एनालिस्ट सारी सलाहों के बाद डिस्क्लेमर लगाते हैं कि उन्होंने जिन स्टॉक्स की चर्चा की, उनमें उनका कोई एक्सपोज़र या निवेश नहीं है। दरअसल, वे शेयर बाज़ार के रिस्क से घबराकर किसी स्टॉक में धन लगाने का जोखिम ही नहीं उठाते। उसी तरह जैसे हलवाई अपनी बनाई मिठाई चखता है, लेकिन खाता नहीं और रेस्टोरेंट वाला रेस्टोरेंट से नहीं, घर से खाना मंगाकर खाता है। दूसरों को कहते फिरते हैं कि चढ़ जा बेटा शूली पर,औरऔर भी

यूं तो पूरा जीवन ही रिस्क से भरा पड़ा है। लेकिन शेयर बाज़ार एक ऐसी जगह है जहां रिस्क ही रिस्क है। किसी को नहीं पता कि आगे क्या हो सकता है। फिर भी कयासबाज़ी चलती है। इतनी ज्यादा कि कयासबाज़ी अपने-आप में शेयर बाज़ार से जुड़ा धंधा बन गई है। बिजनेस न्यूज़ चैनलों पर आनेवाले एनालिस्ट, अखबारों में निवेश पर कॉलम लिखनेवाले विशेषज्ञ और ब्लॉग से लेकर वेबसाइट चलानेवाले रिसर्च एनालिस्ट, सभी के सभी मूलतः कयासबाज़ीऔरऔर भी

जिस तरह देश से लेकर विदेश तक मुद्रास्फीति बढ़ रही है, उसमें इससे निपटने का सबसे अच्छा माध्यम शेयरों में निवेश है। लेकिन अभी शेयर बाज़ार की ही हालत खस्ता है। कभी भी बहुत ज्यादा गिर सकता है और हमारी पूंजी व बचत को डुबा सकता है। फिर कोई निवेशक करे तो क्या करे? उसकी बचत महंगाई के चलते वैसे भी काफी घट चुकी है। इसलिए उसे निवेश में काफी सावधानी बरतनी होगी। एक हिस्सा सुरक्षित रिटर्नऔरऔर भी

किसी को भरोसा नहीं कि रूस-यूक्रेन युद्ध कब खत्म होगा और युदध खत्म भी हो गया तो क्या महंगाई कम या खत्म हो जाएगी? जानकार बताते हैं कि अभी की चढ़ी हुई मुद्रास्फीति तात्कालिक नहीं है। यह लम्बे समय तक बनी रह सकती है। इसका सीधा असर कंपनियों के नतीजों पर पड़ेगा। कम के कम अगली कुछ तिमाहियों तक कॉरपोरेट क्षेत्र का मुनाफा दबा-दबा रहेगा। एक सर्वे के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2022-23 में निफ्टी-50 में शामिलऔरऔर भी

अमेरिका में अभी तक मुद्रास्फीति का मानक 2% रहा है। लेकिन मार्च में वहां रिटेल मुद्रास्फीति 8.5% पर पहुंच गई। खाने-पीने की चीजों और ईंधन को हटा दें तब भी वहां बची मुद्रास्फीति की दर 6.5% के ऊपर निकलती है। मार्च में भारत में रिटेल मुद्रास्फीति 6.95% और थोक मुद्रास्फीति 14.55% के स्तर पर पहुंच चुकी है। इसे थोड़ा समतल करने के लिए रिजर्व बैंक ने कल ब्याज या रेपो दर 4% से बढ़ाकर 4.40% कर दी।औरऔर भी

इन दिनों शेयर बाज़ार के पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकी हुई है। कहीं कोई किसी आशा व उम्मीद की बात नहीं कर रहा। बाज़ार बढ़ते-बढ़ते फिसल जाता है। अब तो निफ्टी में शॉर्ट सेलिंग करने की चर्चा जोर पकड़ती जा रही है। हताशा और निराशा से भरा यह माहौल कब तक चलेगा, किसी को नहीं पता। कुछ अनुभवी अर्थशास्त्री तो यहां तक कहने लगे हैं कि हम बहुत कठिन दौर से गुज़र रहे हैं। भयंकर तूफानऔरऔर भी

रमज़ान महीने की कठिन-कठोर तपस्या, भूख व उपवास के बाद खुशियों का ईद मुबारक़ दिन आता है। इसी तरह रिटेल ट्रेडर के लिए शेयर या वित्तीय बाज़ार में जीतने की खुशी, उसका हुनर लम्बे संघर्ष व अभ्यास के बाद आता है। असल में शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग एक तरह का युद्ध है, लेकिन बराबरी का नहीं। सामने हर तरह की सुविधा – पूंजी से लेकर रिस्क लेने की क्षमता से लैस एचएनआई और देशी-विदेशी संस्थाएं होती हैं.औरऔर भी

बेंजामिन ग्राहम शेयर बाज़ार में निवेश के पितामह हैं। 1949 में छपी उनकी किताब ‘इंटेलिजेंट इनवेस्टर’ निवेश की समझ का मूलाधार है। संभावनामय कंपनियों के शेयर तब खरीदो, जब कोई उन्हें पूछ नहीं रहा हो। फिर इंतजार करो और अंततः वे शेयर आपके लिए दौलत का ढेर लगा देंगे। वॉरेन बफेट से चार्ली मुंगेर तक इसी रास्ते पर चलकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार हो गए। लेकिन क्या निवेश की यह शैली अब भी कारगरऔरऔर भी

सारी गणनाएं कर लें, सारे कैंडल देख लें, आरएसआई से लेकर मूविंग एवरेज तक प्लॉट कर लें। एमएसीडी से लेकर जो भी विद्या जानते हों, सभी आजमा लें। फिर भी पक्का नहीं कि शेयर का भाव उसी दिशा में जाएगा, जैसा हिसाब लगाया है। ऐसे तमाम हिसाब-किलाब व गणनाओं से हम शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग के रिस्क को कम से कम करने की कोशिश करते हैं। याद रखें कि ब़ड़े से बड़ा तुर्रमखां भी ट्रेडिंग के रिस्कऔरऔर भी