बामर लॉरी तेल व प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन काम करनेवाली सरकारी कंपनी है। हालांकि सरकार का निवेश इसमें प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से है और उसे इसकी प्रवर्तक नहीं माना जाता। 1972 से भारत सरकार इसकी मालिक बनी है। अंग्रेजों के जमाने की कंपनी है। 1 फरवरी 1867 को शुरुआत कोलकाता में पार्टनरशिप फर्म के रूप में हुई। शुरुआती सालों में वो चाय लेकर शिपिंग, बीमा से लेकर बैंकिंग और ट्रेडिंग से लेकर मैन्यूफैक्चिरंग तकऔरऔर भी

इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं और जो नतीजा निकला वो न बहुत ज्यादा रहा और न ही बहुत कम। रिजर्व बैंक ने मार्च 2010 से ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला रोक दिया है। उसने अपेक्षा के मुताबिक रेपो दर को 8.5 फीसदी पर यथावत रखा है। इसके अनुरूप रिवर्स रेपो दर भी 7.5 फीसदी पर अपरिवर्तित रही है। शेयर बाजार ने रिजर्व बैंक के इस रुख का स्वागत किया और सेंसेक्स व निफ्टी दोनों में करीब डेढ़औरऔर भी

वयस्क मताधिकार में हर 18 साल के नागरिक को वोट देने का हक है। उसी तरह कंपनियों के शेयरधारकों को कंपनियों के फैसलों में वोट देने का हक होता है। फर्क इतना है कि यहां शेयरों की खास श्रेणियों में मताधिकार की स्थिति बदलती रहती है। प्रेफरेंशियल शेयर का नाम आप लोगों ने सुना ही होगा। एक अन्य तरह के शेयर होते हैं डीवीआर (डिफरेंशियल वोटिंग राइट्स) शेयर। आम शेयरों में तो हर शेयर पर एक वोटऔरऔर भी

गिरे हुए बाजार में भी महंगे शेयर हो सकते हैं और चढ़े बाजार में भी सस्ते। हम बाजार का रुझान निफ्टी और सेंसेक्स से नापते हैं। लेकिन सेंसेक्स के 30 निफ्टी के 50 में शामिल हैं तो दोनों सूचकांकों में कुल मिलाकर 50 शेयर ही हुए। जबकि बाजार में लिस्टेड कुल लिस्टेड कंपनियों की संख्या इस समय 5105 है जिनकी कुल 8536 स्क्रिप्स (प्रपत्र या प्रतिभूतियां) लिस्टेड हैं। टाटा मोटर्स जैसी कई कंपनियों के शेयर, डीवीआर (डिफरेंशियलऔरऔर भी

विज्ञापन लोगों के मासूम मन को छलनेवाला ऐसा करतब है जिस पर नियामक बैठाने की बात तो बार-बार हुई है, लेकिन अभी तक कंपनियों व विज्ञापन जगत के नुमाइंदों से बने संगठन एएससीआई (एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया) को पंच बनाकर रखा हुआ है जिसकी कमान एक क्लर्कनुमा सज्जन, एलन कोल्लाको को सालोंसाल से सौंप रखी है। यह तो वही बात हुई कि ठगों को ही ठगी को रोकने का थानेदार बना दिया। इसीलिए अक्सर लगता हैऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के एक अधिकारी को खूस देकर फर्जी चिट्ठी बनवाने से लेकर मनी लॉन्डरिंग व शेयर बाजार में धांधली करने जैसे अपराधों का दोषी स्टॉक ब्रोकर निर्मल कोटेचा फरार हो गया है। वह भी तब, जब सेबी और रिजर्व बैंक जैसे नियामक ही नहीं आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, आईबी और सीबीआई जैसी एजेंसियां उस पर गिद्ध निगाह रखे हुए थीं। कोटेचा ने तीन साल पहले पिरामिड साइमीरा के शेयरों को जबरन चढाने केऔरऔर भी

बाजार इस समय जिस तरह हर दिन धड़ाम-धड़ाम गिर रहा है, उसमें हमारे-आप जैसे निवेशकों के लिए सबसे बेहतर यह होगा कि बिजनेस चैनलों को देखना बंद कर दें, अगले साल-डेढ़ साल के खर्चों के इंतजाम के लिए पर्याप्त धन बैंक एकाउंट में रख दें और इसके बाद वह अतिरिक्त धन अलग कर लें जिसे हम कई सालों के लिए निवेश कर सकते हैं बगैर इस बात की चिंता किए कि रोज़-ब-रोज़ उसमें कितनी घट-बढ़ हो रहीऔरऔर भी

कॉस्मो फिल्म्स कोई मरी-गिरी कंपनी नहीं है। 1981 में उसने देश में पहली बार बीओपीपी (बाय-एक्सिली ओरिएंटेड पॉलि प्रोलिपीन) फिल्म बनाने की शुरुआत की। इन फिल्मों का व्यापक इस्तेमाल पैकेजिंग व लैमिनेशन के काम में होता है। कंपनी थर्मल लैमिनेशन फिल्म भी बनाती है। उसकी दो उत्पादन इकाइयां औरंगाबाद (महाराष्ट्र) और कर्जण (गुजरात) में हैं। यूं तो कंपनी देश में भी माल बेचती है। लेकिन उसका मुख्य जोर निर्यात पर है क्योंकि अमेरिका व यूरोप से उसेऔरऔर भी

भारत दुनिया की खबरों पर बार-बार उठ्ठक-बैठक कर रहा है, जबकि सबसे विकट हालत में फंसे देश अमेरिका का शेयर सूचकांक, डाउ जोंस 12,000 के स्तर को कसकर पकड़े बैठा है। जब भी कभी यह 12,000 के नीचे जाता है तो फौरन रॉकेट की तरह खटाक से वापस आ जाता है। इसी तरह एस एंड पी 500 सूचकांक ने भी एक ढर्रा बना रखा है और 1250 के आसपास खुद को जमा रहा है। यह उसका ब्रेक-आउटऔरऔर भी

दुनिया ही नहीं, इस सृष्टि की हर चीज हर पल बदलती रहती है। लेकिन परिवर्तन का यह नियम अगर आप किसी आम किसान से पूछेंगे तो वो कहेगा कि ऐसा नहीं है क्योंकि उसकी दुनिया तो कभी बदलती ही नहीं। सूरज के निकलने से लेकर डूबने तक का वही चक्र। न सावन हरे, न भादो सूखे। देश के आम आदमी से पूछेंगे तो वह भी कहेगा कि हां, चीजें बदलती जरूर हैं, लेकिन बेहतर नहीं, बदतर हीऔरऔर भी