यहीं थोड़ी दूर कहीं हमारा बचपन खेल रहा होगा। पड़ोस में कहीं हमारा बुढ़ापा खांस रहा होगा। देखना चाहें तो अपना अतीत व भविष्य अपने ही इर्दगिर्द देख सकते हैं। हम क्या थे, क्या बनेंगे, समझ सकते हैं।और भीऔर भी

अपने को जानने-समझने के लिए दूसरे को जानना समझना जरूरी है। दूसरे के प्रति आप कितने संवेदनशील हैं, इसी से आपकी संवेदनशीलता का पता चलता है। वरना, अपने प्रति तो हर कोई संवेदनशील होता है।और भीऔर भी

निर्वाण कहीं और नहीं, इसी दुनिया, इसी जीवन में मिलता है। यह सम्यक सोच, संतुलित चिंतन और मन की शांति की अवस्था है। दूसरों का कहा-सुना काम आता है, लेकिन सफर हमारा अकेले का ही होता है।और भीऔर भी

काम से काम रखने से ही काम नहीं बनता। हमारे इर्द गिर्द, दुनिया-जहान में बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा होता है जो आज नहीं तो कल हम पर असर डालता है। अपनी ही खोल में मस्त रहने का जमाना नहीं है यह।और भीऔर भी

अक्सर हम ढूंढ कुछ रहे होते हैं और हमें मिल कुछ और जाता है। असल में लगातार चल रही इस दुनिया में कुछ लोगों, कुछ चीजों को हमारी भी तलाश रहती है। हमने उसे खोजा या उसने हमको, इससे फर्क नहीं पड़ता।और भीऔर भी