इस साल फरवरी से म्यूचुअल फंड निवेशकों की संख्या में शुरू हुआ घटने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। यह संख्या म्यूचुअल फंड फोलियो से गिनी जाती है। म्यूचुअल फंडों के साझा मंच एम्फी (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड एसोसिएशन इन इंडिया) के आंकड़ों के अनुसार फरवरी से अगस्त 2010 के बीच म्यूचुअल फंड फोलियो की संख्या में 5.84 लाख की कमी आ चुकी है। फरवरी में कुल म्यूचुअल फोलियो 483.09 लाख थे, जबकि अगस्त अंतऔरऔर भी

शेयरों के उतार-चढ़ाव को थामने के लिए पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने उन्हें ट्रेड फॉर ट्रेड (टीएफटी) सेगमेंट में डालने का जो फैसला किया है, उससे निवेशकों का नहीं, बल्कि बाजार के उस्ताद खिलाड़ियों या ऑपरेटरों का ही भला होगा। सेबी ने आम निवेशकों से जुड़े इतने अहम मसले पर गौर करते हुए बहुत सामान्य बातों का भी ध्यान नहीं रखा है। यह कहना है शेयर बाजार से जुड़ी एक महत्वपूर्ण ब्रोकर फर्म के प्रमुख का।औरऔर भी

अगर किसी लिस्टेड कंपनी में प्रवर्तकों की शेयरधारिता से बचे हिस्से का कम से कम 50 फीसदी भाग डीमैट (डीमैटरियलाइज्ड) रूप में नहीं हुआ तो 31 अक्टूबर 2010 के बाद उनके शेयरों में ट्रेडिंग सामान्य सेगमेंट में नहीं हो सकती। पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने यह सर्कुलर गुरुवार को सभी स्टॉक एक्सचेंजों को भेजा है। हालांकि इसे सार्वजनिक शुक्रवार को किया गया। सेबी ने स्टॉक एक्सचेंजों से कहा है कि 31 अक्टूबर तक कंपनियों से यहऔरऔर भी

सारी लिस्टेड मीडिया कंपनियों को बताना होगा कि कॉरपोरेट क्षेत्र के साथ उन्होंने किस तरह की ‘प्राइवेट ट्रीटी’ कर रखी है। पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की सहमति ने यह नियम बना दिया है। सेबी का कहना है कि बहुत सारे मीडिया समूहों ने कंपनियों के साथ गठबंधन कर रखे हैं। खासकर ऐसे रिश्ते उन कंपनियों के साथ हैं जो पहले से लिस्टेड हैं या पब्लिक ऑफर लानेवाली हैं। ये कंपनियां कवरेजऔरऔर भी

हमारी बाजार नियामक संस्था, सेबी और गरीब रिटेल निवेशक कितने असहाय हैं, इसे इंडिया फॉयल्स के स्टॉक से समझा जा सकता है। हम पहले भी लिख चुके हैं कि किस तरह इंडिया फॉयल्स के नए प्रवर्तक एस डी (Ess Dee) ग्रुप ने इसके शेयर खुले बाजार में 20 रुपए के भाव पर बेचे और इसका भाव 5 रुपए या उससे से भी नीचे ले गए। इसके बाद कुछ शेयरधारक कंपनी प्रबंधन से मिले तो उन्हें समझा दियाऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने पब्लिक इश्यू (आईपीओ व एफपीओ) में रिटेल निवेशकों की निवेश सीमा को एक लाख रुपए से बढ़ाकर दो लाख रुपए करने की पेशकश की है। मजे की बात है कि इसके लिए उसने मुद्रास्फीति के बढ़ने का तर्क दिया है, जबकि शेयर के इश्यू मूल्य का कोई सीधा रिश्ता मुद्रास्फीति से नहीं होता। उसने इस बारे में एक बहस पत्र पेश किया है जिसमें सभी संबंधितऔरऔर भी

बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) और पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के बीच यूलिप (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी) को लेकर मची जंग के पटाक्षेप के बाद अब बीमा कंपनियों के लिए संभवत: यूलिप का आकर्षण कम हो सकता है। लिहाजा अब वे यूनिवर्सल लाइफ पॉलिसी (यूएलपी) लाने की संभावनाएं तलाश कर रही हैं। एक उत्पाद में दो फायदे: यूएलपी दरअसल एक उत्पाद में दो प्रकार की पॉलिसियों के फायदे देती है। यह यूलिप व परंपरागत प्लान कीऔरऔर भी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी को निर्देश दिया कि वह 30 सितंबर तक एमसीएक्स-एसएक्स को इक्विटी ट्रेडिंग की इजाजत देने के बारे में दो टूक फैसला करे। साफ-साफ बताए कि वह इसकी इजाजत दे रही है या नहीं और नहीं तो क्यों। साथ ही कोर्ट ने एमसीएक्स-एसएक्स को भी निर्देश दिया कि वह दस दिन के भीतर अपने बोर्ड में प्रस्ताव पास करे कि एक्सचेंज में प्रवर्तकों की शेयरधारिता 5 फीसदी कीऔरऔर भी

जब हर तरफ देश के अर्थ, व्यापार व वित्त जगत पर अंग्रेजी का आधिपत्य हो तो यह जरूरी हो जाता है कि हम हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं की संभावनाओं और स्वाभिमान को जगाते रहे। यह जो खबर आप ठीक बगल में नवा जूनी में देख रहे हैं, इसे इकोनॉमिक टाइम्स ने आज अपनी लीड बनाई है। लेकिन हमने यह खबर साल भर पहले ही पेश कर दी थी। इससे मैं यकीकन एक आश्वस्ति का भाव अपनेऔरऔर भी

अभी तक लिस्टेड कंपनियां अपनी शेयरधारिता का ब्यौरा हर तिमाही के बीतने पर साल में चार बार सार्वजनिक करती रही हैं, भले ही तिमाही के दौरान कितना भी उलटफेर हो जाए। लेकिन अब शेयरधारिता में जब भी कभी दो फीसदी से ज्यादा की घट-बढ़ होगी, उन्हें उसके दस दिन के भीतर स्टॉक एक्सचेजों को सूचित करना होगा और एक्सचेंज इस सूचना को तत्काल अपनी वेबसाइट पर कंपनी की उद्घोषणा के रूप में पेश कर देंगे। यह फैसलाऔरऔर भी