अलग-थलग कोने में बैठकर ज्ञान बघारना, जुमले उछालना और फतवे फेंकना बड़ा आसान है। लेकिन सत्ता, शोहरत व समृद्धि की जंग में पहुंचते ही ऐसे लोग लहूलुहान चूजों की तरह भाग खड़े होते हैं।और भीऔर भी

पैसा बांटने से घटता है। लेकिन ज्ञान को जितना बांटों,  बढ़ता जाता है। ज्ञान तो शहद की तरह है। फूल से निकलता है तो बढ़ता ही है। मधुमक्खियां उसे ले जाकर पूरा छत्ता ही बना लेती हैं।और भीऔर भी

राजनीति में अपराध और धन के हावी होने का दोष अक्सर अनपढ़, गंवार और जाति-धर्म के दलदल में धंसी जनता पर मढ़ दिया जाता है। लेकिन यह कितना बड़ा झूठ है, यह साबित कर देता है 14 व 17 जून को दो चरणों में संपन्न हुआ राज्यसभा का चुनाव जिसमें चुनने का काम हमारे सांसद और विधायक जैसे जनप्रतिनिधि ही करते हैं। यह साबित कर देता है कि राजनीतिक पार्टियों का आलाकमान और उनके ज्यादातर नेता भाषणोंऔरऔर भी

कोई कहता है पैसा तो हाथ की मैल है। दूसरा कहता है यह सब हमारे बड़े बुजुर्गों का ढकोसला था और सभी पैसे के पीछे भागते रहे हैं। कुबेर का खजाना, कारूं का खजाना, गड़ा हुआ धन, पैसे का पेड़। न जाने कैसी-कैसी मान्यताएं रहीं हैं अपने यहां। सब समय-समय की बात है। समय बदल चुका है, पैसे की हकीकत भी बदल चुकी है। खुदाई में मिले धन की खबर पुलिस को नहीं दी तो जेल जानाऔरऔर भी

मुद्रा को अंग्रेजी में मनी कहते हैं जो खुद लैटिन के शब्द मोनेटा से निकला है। इटली को लोक कथाओं के अनुसार मोनेटा स्वर्ग की रानी, देवी जूनों का शुरुआती नाम है। प्राचीन काल में रोम में सिक्कों की ढलाई का काम भी जूनों के मंदिरों में होता था। शायद यही चलन मोनेटा से होते हुए मनी तक पहुंचने का सबब बन गया। आज तो मुद्रा को रेलवे स्टेशन पर शंटिंग करनेवाले इंजिन की तरह मानते हैंऔरऔर भी

“हम उस दौर में रह रहे हैं जहां समय भी पूंजी है और कोई भी जीवन की दौड़ में किसी से पीछे रहने को तैयार नहीं हैं। लेकिन इस भागमभाग में समय को नाथना जरूरी है। उसका नियोजन जरूरी है। नहीं तो समय बड़ी बेरहमी से हमें कुचलता हुआ आगे निकल जाता है।”और भीऔर भी