जीवन की यात्रा और उसमें हर मोड़ पर सीखना एक अटूट श्रृंखला है। हम नहीं रहते तो हमारे बाल-बच्चे इसे आगे बढ़ाते हैं। कड़ी कभी कहीं टूटती। जब तक यह सृष्टि है, तब तक यह टूटेगी भी नहीं। लेकिन अगर अगली यात्रा तक पिछली यात्रा के सबक याद न रखे जाएं तो अंत में हम खाली हाथ रह जाते हैं। बर्तन के पेंदे में छेद हो तो उसमें डाला गया सारा तरल निकलता जाता है। इसलिए मित्रों!औरऔर भी

बुद्ध ने शांत जीवन के आठ आधार बताए हैं। सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति व सम्यक समाधि। पर इस सम्यक का सिरा क्या है?और भीऔर भी

जमीन की हर इंच पर कोई न कोई काबिज है। मांगने पर महाभारत तय है। यूं तो व्योम भी हमारा है। पर, उसकी नींव के लिए भी जमीन चाहिए। इसलिए जीवन में संघर्ष के सिवा कोई रास्ता नहीं है पार्थ!और भीऔर भी

जब आप सिर्फ जिए चले जाते हो तो आप मन व शरीर के गुलाम होते हो। जब आप सोचकर जीते हो तब आप मन व शरीर के सारथी होते हो। जब आप लीक से हटकर जीते हो तो आप दृष्टा बन जाते हो।और भीऔर भी

प्रकृति से कैसे निपटना है, यह तो हर जीव की तरह हम मां के पेट से सीखकर आते हैं। समाज से निपटने की शुरुआती सीख हमें घर-परिवार, स्कूल व परिवेश से मिलती है। फिर जंग में हम अकेले होते हैं।और भीऔर भी

कहते हैं कि ग्राहक भगवान होता है पर अभी कुछ समय पहले तक भारत की बीमा कंपनियों का सोचना इससे उलट था। उनके लिए पॉलिसीधारक ऐसा निरीह प्राणी होता था जो शायद परेशानी सहने के लिए अभिशप्त है। लेकिन बीमा नियामक व विकास प्राधिकरण (आईआरडीए या इरडा) की पहल से अब माहौल बदल चुका है। कैसी समस्याएं: अमूमन जीवन बीमा पॉलिसीधारकों को जो समस्याएं सताती हैं उनमें खास हैं – पॉलिसी बांड नहीं मिला, गलत पॉलिसी बांडऔरऔर भी

योग महज कसरत नहीं, बल्कि कर्म में कुशलता का नाम है। हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग इसलिए व्यर्थ चला जाता है क्योंकि या तो हम गलत काम करते हैं या फिर सही काम को गलत ढंग से करते हैं।और भीऔर भी

दुनिया के बाजार जापान की बात बिसूर चुके हैं, जबकि भारतीय बाजार अब भी अपनी लय पकड़ने की जद्दोजहद में लगा है। यह दिखाता है कि भारत की गति दुनिया से भिन्न है। विश्व बाजार से भारत के असंपृक्त या जुदा होने और पूरी तरह समाहित होने के दोनों ही सिद्धांत गलत साबित हो चुके हैं। असल में भारत में एक ही सिद्धांत चलता है और वह है गठजोड़ का सिद्धांत। यहां गठजोड़ से सरकार चलती है।औरऔर भी

दुनिया में ऐसा कुछ नहीं जो किसी न किसी को पता न हो या उसे जानने की कोशिश न चल रही हो। सबको सब पता रहे, जरूरी नहीं। लेकिन ज़िंदगी का दायरा जितना बड़ा हो, उतना तो जानना जरूरी है।और भीऔर भी

इंसान की सृजनात्मकता निठल्ले चिंतन की उपज नहीं होती। संघर्ष-विहीन जीवन से सृजन नहीं, उबासियां निकलती हैं। कठोर वास्तविकता की रगड़-धगड़ से ही सृजन की चिनगारी फूटती है।और भीऔर भी