संख्याएं चलाती हैं हमारी जिंदगी। क्या करेंगे, क्या पाएंगे – सारा हिसाब करती हैं संख्याएं। समय तक को बांधती हैं संख्याएं। हम इनसे भाग नहीं सकते। हां, उन्हें उंगलियों के पोरों पर जरूर रख सकते हैं।और भीऔर भी

सत्ता मिलते ही मरतक नेताओं तक के चेहरे चमकने लगते हैं, स्वास्थ्य दमकने लगता है, आयु बढ़ जाती है। सत्ता का यही प्रताप है। जनता को भी सत्ता दे दी जाए तो उसका भी सारा दुख-दारिद्र मिट सकता है।और भीऔर भी

माना कि इच्छाएं ही दुख का मूल कारण हैं। अमीर से अमीर शख्स भी और ज्यादा पाने के चक्कर में दुखी रहता है। लेकिन इच्छाएं है, तभी तो जीवन है। कला व ज्ञान-विज्ञान का स्रोत भी तो इच्छाएं ही हैं।और भीऔर भी

जीवन के नए-नए अनुभव व सच हमें लंगड़ी टांग पर खड़ा कर देते हैं। हम जहां से, तहां से टेढ़े हो जाते हैं। विचार और कुछ नहीं, इस सारे टेढ़ेपन को दूर कर हमें सीधा व संतुलित बनाने का काम करते हैं।और भीऔर भी

इतने कम में काम कैसे चला लेते हो भाई! जरूरतें बढ़ाओ और उनको पूरा करने का पुरुषार्थ करो। नहीं तो जिंदगी यूं ही अकारथ चली जाएगी और आप जहां से चले थे, वहीं तक सिकुड़े रह जाएंगे।और भीऔर भी

आदतों के बिना ज़िंदगी नहीं चलती। एकदम रसहीन बन जाती है। इसलिए आदतें तो डालनी ही पड़ती हैं। अब यह आप पर है कि आप खुद को अच्छी आदतों का गुलाम बनाते हैं या बुरी आदतों का।और भीऔर भी

जब समय का कोई अंत नहीं, तब संभावनाओं का अंत कैसे हो सकता है? हां, पुराने से चिपके रहने का कोई तुक नहीं। सबक लेकर नए को आजमाना जरूरी है। तब तक, जब तक जीवन शेष है, समय शेष है।और भीऔर भी

हिसाब लगाएं तो पता चलेगा कि हम तीन चौथाई से ज्यादा जीवन प्रतिक्रिया में जीते हैं। लेकिन प्रतिक्रिया नहीं, क्रिया-प्रधान जीवन होना चाहिए हमारा। दूसरे नहीं, हम ही तय करें कि हमें क्या करना है।और भीऔर भी

जब हम जवान होते हैं तो छोटी सी छोटी बात पर मरने पर उतारू हो जाते हैं। बूढ़े होते जाते हैं तो बड़ी सी बड़ी बात होने पर भी जीते रहना चाहते हैं। उम्र इफरात तो कोई भाव नहीं! उम्र कम तो इतना मूल्य!!और भीऔर भी

हर काम हर पल दुनिया में कहीं न कहीं होता रहता है। जीना-मरना, हंसना-रोना, मिलना-बिछुड़ना। अंतहीन छोरों से बंधी डोर उठती है, गिरती है। झूले या सांप नहीं, सागर की लहरों की तरह दौड़ती है जिंदगी।और भीऔर भी