शेयर बाजार में आया आतंकवादी धन आखिर है कहां? मीडिया ने जब तीन साल पहले इस पर जमकर हल्ला मचाया था, तब क्यों नहीं इसकी तहकीकात की गई? अब अचानक आतंकवादी धन का मसला उछाल दिया गया जिससे भारतीय शेयर बाजार को करीब 600 अंकों का धक्का लग चुका है। क्या कोई इसके पीछे का कोई तर्क या तुक समझा सकता है? सबसे अहम बात यह है कि इसे तब उछाला गया है जब संसद में बहसऔरऔर भी

जीवन संविधान से मिला मूल अधिकार है। पर जब हमारे होने, न होने से किसी को कोई फर्क न पड़े तो हम जीते हुए भी मर जाते हैं। अगर आज करोड़ों लोग अप्रासंगिक हैं तो यह तंत्र ही संविधान-विरोधी है।और भीऔर भी

ज़िंदगी हमारी अपनी है। पर धरती हम साझा करते हैं। हवा-धूप साझा करते हैं। दुनिया साझा करते हैं। देश साझा करते हैं। प्रशासन व राजनीतिक तंत्र साझा करते हैं। जो साझा है, उसकी भी तो फिक्र जरूरी है।  और भीऔर भी

यूरोप के मसले ने उन सभी निवेशकों व ट्रेडरों को चरका दे दिया जो उस बहस और शॉर्ट सेलिंग करते रहे। निफ्टी 4700 से सुधरता हुआ 5350 तक आ चुका है और अब 5500 के पार जाने को तैयार है। इसके आसपास पहुंचते ही टेक्निकल एनालिसिस के हिसाब से एफआईआई खरीद की भंगिमा अपना लेंगे क्योंकि 200 डीएमए (200 दिनों के मूविंग औसत) अभी 5406 है और बाजार के इसके ऊपर जाने पर आप शॉर्ट नहीं रहऔरऔर भी

संपूर्ण कमोबेश स्थिर है। पर अंश बराबर रीसाइकल होता रहता है। बनने-मिटने-बनने का चक्र अनवरत चलता है। ये नीरस-सा चक्र ही जीवन है। यह चक्र रुक जाए तो हर तरफ हाहाकार मच जाएगा।और भीऔर भी

ज्ञान तो विशाल सागर नहीं, अक्षय पात्र है। पुराना निकालो, नया बनता जाता है। कभी शेष नहीं होता। जब तक जीवन है, तब तक मन खदबद करता रहता है और ज्ञान का नया सत्व निकलता रहता है।और भीऔर भी

जीवन में एक ही चीज निश्चित है। वो है मौत। बाकी सब कुछ अनिश्चित है। ऐसे में भविष्य से घबराने की क्या जरूरत! क्योंकि इन अनिश्चितताओं को नाथकर अपना भविष्य तो हम खुद ही बना सकते हैं।और भीऔर भी

नई धारणाएं पुराने शब्दों में नहीं बांधी जा सकतीं। वे जीवन में जिस रूप, जिस भाषा में आएं, उन्हें वैसे ही स्वीकार करना होगा। नया हमारे हिसाब से नहीं ढलेगा। हमें ही उसके हिसाब से ढलना होगा।और भीऔर भी

जब कुछ भी साफ समझ में न आए तो खुद को संयोगों के भरोसे छोड़ देना चाहिए। वैसे भी हमारी जिंदगी में सच कहें तो 20% ही योजना और 80% संयोग काम करते हैं। इसे मान लेने में क्या हर्ज है?और भीऔर भी

मौत से क्या डरना! वह तो किसी पल आएगी और हाथ पकड़कर साथ ले जाएगी। डरना तो जिंदगी से चाहिए जिसे पल-पल जीना पड़ता है, संभालना पड़ता है। जहां जरा-सी चूक पूरी जिंदगी को नरक बना सकती है।और भीऔर भी