बाहरी कृपा से कभी किसी का कल्याण नहीं होता। हमें अपना कल्याण खुद अपनी मेहनत, काम और दूसरों के सहयोग से करना होता है। दूसरा केवल राह दिखा सकता है। चलने का अभ्यास हमें खुद करना पड़ता है। यह बात आम जीवन के साथ ही ऑप्शन ट्रेडिंग के गुर सीखने पर भी लागू होती है। इसके अलावा यह गुर सीखने की एक और बुनियादी शर्त है कि जोड़-घटाने, हिसाब-किताब में आपकी रुचि होनी चाहिए। अगर सामान्य गणितऔरऔर भी

अगर हमने ऑप्शन के भाव निकालने का तरीका नहीं समझा तो हम 100 में से 88 बार हारते ही रहेंगे और अपना प्रीमियम गंवाते ही रहेंगे। दिक्कत यह है कि अगली बार जीत जाएंगे, इस भ्रम और भरोसे में रिटेल ट्रेडर हमेशा इंडेक्स ऑप्शन खरीदने में जुटे रहते हैं। अगर लगा कि बाज़ार बढ़ सकता है तो निफ्टी या बैंक निफ्टी का कॉल ऑप्शन खरीद लिया और गिरने की धारणा हो तो इनका पुट ऑप्शन खरीद लिया।औरऔर भी

ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का भाव तो बाजार निर्धारित करता है। लेकिन व्यवहार में देखें तो भाव बेचनेवाले तय करते हैं, खरीदनेवाले नहीं। फिर भी रिटेल ट्रेडर के पास यह सुविधा होती है कि वह अपने अध्ययन व समझ से यह परख सकें कि बाज़ार में चल रहा ऑप्शन का भाव सही है या नहीं। अगर उसके भाव बढ़ाकर रखे गए हैं तो वह बिना लालच में फंसे उससे दूर रह सकता है और किसी वजह से वाजिब याऔरऔर भी

ऑप्शन के भाव निकालने के अलग-अलग मॉडल हैं। हमने बायनॉमिअल मॉडल पर नज़र डाल ली। अब ब्लैक-शोल्स मॉडल को गहराई से समझने की बारी है। साथ ही एडिसन ह्वेल (Adison Whaley) मॉडल भी है। कोई इस मॉडल को परिष्कृत बताता है तो कोई उसे। पर हमें उसी मॉडल को लेना चाहिए जिसकी गणना आसानी से की जा सके। बायनॉमिअल मॉडल में प्रायिकता से लेकर बांड के रिटर्न के साथ मिलान जैसी ऐसी उलझनें हैं कि माथा घूमऔरऔर भी

हमने बायनॉमिअल प्राइसिंग मॉडल में बैंकवर्ड इंडक्शन करते हुए ऑप्शन का भाव पोर्टफोलियो के मिलान या रेप्लिकेशन से निकाला। हमने यह भी देखा कि गिनने में यह तरीका ज्यादा ही जटिल है। मात्र दो ही चरणों में बहुत सारी गणनाएं करनी पड़ीं। इसकी तुलना में रिस्क न्यूट्रल वैल्यूएशन इस मॉडल का काफी आसान तरीका है। इसमें गणना कई चरणों में नहीं करनी पड़ती। सब कुछ आसान व सहज है। वैसे, यह कैसे काम करता है और इसमेंऔरऔर भी

ऑप्शन प्राइसिंग के ब्लैक-शोल्स मॉडल की तह में जाने से पहले हम एक दूसरे प्राइसिंग मॉडल को जानने की कोशिश करते हैं जो बाद में ब्लैक-शोल्स मॉडल को ठीक से जानने में काम आ सकता है। यह है बायनोमिअल मॉडल। हम इसे यूरोपियन कॉल ऑप्शन पर लागू करके उसका भाव निकालेंगे। बाद में पुट ऑप्शन का भाव कॉल-पुट समता के आधार पर निकाल सकते हैं। याद रखें कि यूरोपियन ऑप्शन सौदे एक्सपायरी के वक्त ही काटे जाऔरऔर भी

अगर आप ऑप्शन ट्रेडिंग करना चाहते हैं तो सबसे पहले यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि इसमें 88 प्रतिशत प्रायिकता ऑप्शन बेचनेवाले या राइटर के मुनाफा कमाने की होती है और केवल 12 प्रतिशत प्रायिकता इस बात की होती है कि ऑप्शन खरीदनेवाला जीतकर लाभ कमा सके। यह निष्कर्ष किसी के मन की बात नहीं, बल्कि इसे दुनिया के पहले ऑप्शन एक्सचेंज, शिकागो बोर्ड ऑफ ऑप्शन एक्सचेंज (सीबीओई) के करीब डेढ़ सौ साल के डेटा केऔरऔर भी

अप्रैल माह का आखिरी दिन। गुरुवार था तो डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी या सेटलमेंट का दिन। इसके विस्तृत आंकड़ों में वह तस्वीर छिपी है जो हमें ऑप्शन ट्रेडिंग की व्यावहारिक स्थिति, उसके विस्तार व महत्व से वाकिफ करा सकती है। इसलिए आज हम इन्हीं आंकडों की तह में पैठेंगे और अब तक हासिल की गई समझ की धार को थोड़ा तेज़ करने की कोशिश करेंगे। एनएसई में कल गुरुवार, 30 अप्रैल को समूचे एफ एंड ओ (फ्यूचर्सऔरऔर भी

आज महीने का अंतिम गुरुवार होने के नाते अप्रैल के डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी का दिन है। यह दिन आपके लिए बहुत अहम है क्योंकि आज ऑप्शन के भाव, निफ्टी के सेटलमेंट भाव और अलग-अलग कॉल व पुट ऑप्शन की स्थिति पर बारीकी से नज़र डालकर आप ऑप्शन ट्रेडिंग के पैटर्न को समझने का आधार बना सकते हैं, इस पाठ-श्रंखला में अब तक की दस कड़ियों में जो भी पढ़ा है और जो भी समझा है, उसेऔरऔर भी

जीवन के तमाम क्षेत्रों की तरह डेरिवेटिव ट्रेडिंग में भी सिद्धांत और व्यवहार में बड़ा फर्क होता है। फिर भी सिद्धांत जानना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम व्यवहार में उतरने का आत्मविश्वास जुटा सकें। उसके बाद उतर गए तो असली दीक्षा व्यवहार ही देता है। मसलन, सिद्धांत कहता है कि ऑप्शन खरीदने में सीमित नुकसान और असीमित लाभ है क्योंकि खरीदने वाले को अधिक से अधिक चुकाया गया भाव या प्रीमियम ही गंवाना पड़ता है, जबकि शेयरऔरऔर भी