पिछली नहीं, खेलती है भावी चंचलता

ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का भाव तो बाजार निर्धारित करता है। लेकिन व्यवहार में देखें तो भाव बेचनेवाले तय करते हैं, खरीदनेवाले नहीं। फिर भी रिटेल ट्रेडर के पास यह सुविधा होती है कि वह अपने अध्ययन व समझ से यह परख सकें कि बाज़ार में चल रहा ऑप्शन का भाव सही है या नहीं। अगर उसके भाव बढ़ाकर रखे गए हैं तो वह बिना लालच में फंसे उससे दूर रह सकता है और किसी वजह से वाजिब या कम हैं तो उन पर दांव लगाकर मुनाफा कमा सकता है।

ब्लैक-शोल्स मॉडल उसे यही परखने का ज्ञान या क्षमता देता है (भले ही वह सैद्धांतिक स्तर पर हो) कि ऑप्शन का भाव वाजिब है या नहीं। कॉन्ट्रैक्ट के अंत में ऑप्शन का मूल्य संबंधित स्टॉक या सूचकांक के सेटलमेंट मूल्य और ऑप्शन के स्ट्राइक मूल्य के अंतर या अंतर्निहित मूल्य पर आकर टिक जाता है। इसलिए हमें सारी समझ का इस्तेमाल एक्सपायरी के पहले ऑप्शन के भाव के मूल्यांकन पर करना होता है। यहीं पर ऑप्शन ट्रेडिंग से कमाने का सारा खेल बसा हुआ है, सारा रहस्य छिपा हुआ है।

ब्लैक-शोल्स मॉडल में एक कठिन अवधारणा है वोलैटिलिटी की। कल हमने इस पर थोड़ी चर्चा की। बात यहां पर खत्म हुई थी कि वोलैटिलिटी के आंकडे को हमेशा सांख्यिकी की नॉर्मल डिस्ट्रीब्यूशन की कॉन्सेप्ट से जोड़कर व्याख्यायित या इस्तेमाल किया जाता है। हमने देखा था कि निफ्टी की दैनिक वोलैटिलिटी 3.5 प्रतिशत है। यह उसका दैनिक स्टैंडर्ड डेविएशन है। दूसरे शब्दों में इधर निफ्टी रोज़ाना औसतन 3.5 प्रतिशत ऊपर-नीचे हो रहा है। नॉर्मल डिस्ट्रीब्य़ूशन की पद्धति अपनाएं तो इसका मतलब होगा कि निफ्टी के मूल्य का दायरा एक स्टैंडर्ड डेविएशन (3.5% ऊपर-नीचे) में रहने की प्रायिकता 68 प्रतिशत, दो स्टैंडर्ड डेविएशन (7% ऊपर-नीचे) में रहने की प्रायिकता 95 प्रतिशत और तीन स्टैंडर्ड डेविएशन (10.5% ऊपर-नीचे) में रहने की प्रायिकता 99.7 प्रतिशत है।

स्टैंडर्ड डेविएशन या वोलैटिलिटी और नॉर्मल डिस्ट्रीब्यूशन की कॉन्सेप्ट हमें स्ट्राइक प्राइस चुनने में काफी मददगार साबित हो सकती है। बता दें कि वोलैटिलिटी में हम अमूमन महीने भर के भावों के उतार-चढ़ाव पर निकालते हैं। लेकिन 10 से 20 दिन के भावों पर निकाली गई वोलैटिलिटी ज्यादा काम की होती है। स्टॉक या सूचकांक के पुराने भावों के आधार उसकी ऐतिहासिक वोलैटिलिटी निकाली जाती है। वैसे तो ऑप्शन के भावों पर वोलैटिलिटी का बहुत असर पड़ता है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि ऐतिहासिक वोलैटिलिटी उन पर ऐसा असर दिखा सके। ऐसा इसलिए क्योंकि बाज़ार में सक्रिय ट्रेडरों को लग सकता है कि आगे व वोलैटिलिटी बढ़ सकती है। इसलिए ऐतिहासिक वोलैटिलिटी के बजाय इम्प्लायड वोलैटिलिटी ज्यादा काम की होती है और वही बाज़ार में चलती भी है।

हम इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। निफ्टी की डेली वोलैटिलिटी इस समय 3.5% और सालाना वोलैटिलिटी 66.86% चल रही है। कल निफ्टी में 9150 के स्ट्राइक मूल्य और 28 मई 2020 की एक्सपायरी वाले पुट ऑप्शन का भाव 298.95 रुपए रहा है। इसके भाव की गणना हम ब्लैक-शोल्स मॉडल से करें और उसमें ऐतिहासिक वोलैटिलिटी 66.86%, रिस्क-फ्री ब्याज की दर 6% और लाभांश यील्ड 0% डालें तो पुट ऑप्शन का भाव 529.18 रुपए निकलता है। लेकिन ऐतिहासिक वोलैटिलिटी की जगह इम्प्लाइड वोलैटिलिटी, जो अभी 39.42% है, का इस्तेमाल करें तो इसी पुट ऑप्शन का भाव 306.56 रुपए हो जाता है। यह बाज़ार में इस पुट ऑप्शन के बंद भाव 298.95 रुपए के काफी करीब और 284 से 329.55 की रेंज के भीतर है। ब्लैक-शोल्स फॉर्मूले में हम वोलैटिलिटी का आंकड़ा 38.55% रख दें कि पुट ऑप्शन का भाव 298.97 रुपए निकल आता है, यानी वास्तविक भाव जितना।

यह है इम्पलायड वोलैटिलिटी का व्यावहारिक महत्व। एनएसई हर ऑप्शन के भाव के साथ इसका भी आंकड़ा रोजाना देता है। लेकिन जैसा कि हमने देखा कि ब्लैक-शोल्स फॉर्मूले के परिणाम और वास्तविक भाव में फिर भी अंतर रह जाता है, हालांकि यह अंतर ऐतिहासिक सालाना वोलैटिलिटी को गणना में रखने की तुलना में काफी कम रहता है। इसलिए इतना तो तय है कि हमें गणना में ऐतिहासिक के बजाय इम्प्लायड वोलैटिलिटी का इस्तेमाल करना होगा।

ऑप्शन का भाव निर्धारित करने में इम्प्लायड वोलैटिलिटी की बड़ी भूमिका होती है। असल में किसी को भी पता नहीं होता कि बाज़ार या कोई स्टॉक आगे कितनी उठा-पटक मचा सकता है। ऐसे में लोग भावी अनुमान के लिए इम्प्लायड वोलैटिलिटी का सहारा लेते हैं। अगर इम्प्लायड वोलैटिलिटी ज्यादा है तो ऑप्शन का भाव या प्रीमियम ज्यादा रहेगा और कम है तो कम। लेकिन हमेशा ध्यान रखें कि इम्प्लायड वोलैटिलिटी की सटीक गणना नहीं की जा सकती क्योंकि यह तथ्यों के बजाय प्रायिकता पर निर्भर है।

यह भी ध्यान रखें कि हमें इम्प्लायड वोलैटिलिटी और ऐतिहासिक वोलैटिलिटी में कभी कन्फ्यूज नहीं करना चाहिए। जहां ऐतिहासिक वोलैटिलिटी अतीत के वास्तविक डेटा के आधार पर निकाली जाती है, वहीं इम्प्लायड वोलैटिलिटी में अतीत को ध्यान में ज़रूर रखा जाता है, लेकिन यह भविष्य के अनुमानों पर ज्यादा आधारित होती है। यह अतीत के आधार पर भविष्य का अनुमान लगाती है जो पूरी तरह गलत भी हो सकता है। इम्प्लायड वोलैटिलिटी की गुत्थी को आगे हम थोड़ा और समझने की कोशिश करेंगे क्योंकि तभी ऑप्शन प्राइसिंग की सही नब्ज पकड़ी जा सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.