वहां जो उलझा था, यहां बड़ा आसान

हमने बायनॉमिअल प्राइसिंग मॉडल में बैंकवर्ड इंडक्शन करते हुए ऑप्शन का भाव पोर्टफोलियो के मिलान या रेप्लिकेशन से निकाला। हमने यह भी देखा कि गिनने में यह तरीका ज्यादा ही जटिल है। मात्र दो ही चरणों में बहुत सारी गणनाएं करनी पड़ीं। इसकी तुलना में रिस्क न्यूट्रल वैल्यूएशन इस मॉडल का काफी आसान तरीका है। इसमें गणना कई चरणों में नहीं करनी पड़ती। सब कुछ आसान व सहज है। वैसे, यह कैसे काम करता है और इसमें बायनोमिअल मॉडल के पहले तरीके जितना ही नतीजा कैसे निकल आता है, इसे समझना बहुत सहज नहीं है।

रेप्लिकेटिंग पोर्टफोलियो तरीके में हम मानकर चले कि निवेशकों को रिस्क की कोई परवाह नहीं होती। उन्हें केवल रिटर्न से मतलब होता है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता। हर निवेशक रिस्क से घबराता है। वह कम से कम रिस्क लेना चाहता है। कुछ निवेशको को रिस्क से ज्यादा डर लगता है तो कुछ कम डरते हैं। हालांकि ऑप्शन का भाव कितना होगा, इस पर निवेशकों की रिस्क के प्रति घबराहट या स्वीकार से कोई फर्क नहीं पड़ता। जो ऑप्शन में निवेश करता है, वह जितना रिस्क लेना था, ले ही चुका है। कहावत भी है कि जब ओखल में सिर दिया तो मूसल का क्या डर!

जैसे ही हम मान लेते हैं कि निवेशक रिस्क को लेकर एकदम बेपरवाह, न्यूट्रल हैं, उन्हें रिस्क से कोई फर्क नहीं पड़ता, वैसे ही ऑप्शन का मूल्य-निर्धारण बड़ा आसान हो जाता है। रिस्क-मुक्त दुनिया में सारी आस्तियां रिस्क-फ्री दर से बढ़नी चाहिए। ऐसा न हो तो यहां से खरीदकर वहां बेचने और आर्बिट्राज़ से फायदा कमाने का सिलसिला चल निकलेगा। फाइनेंस के रिस्क-मुक्त हालात में मूल्य निर्धारण काफी सुविधाजनक हो जाता है क्योंकि हम सारे भावी कैश फ्लो को रिस्क-फ्री ब्याज दर पर डिस्काउंट कर सकते हैं।

तब हम ऑप्शन का भाव निकालने के लिए हर नोड पर ऑप्शन का अपेक्षित पे-ऑफ निकालते हैं और फिर उन्हें रिस्क-फ्री ब्याज दर से डिस्काउंट कर देते हैं। इस क्रम में हमारा पहला कदम होता है स्टॉक के ऊपर या नीचे जाने की प्रायिकता या प्रोबैबिलिटी। रिस्क-मुक्त माहौल में इन्हें रिस्क न्यूट्रल प्रायिकता कहा जाता है। अगर हर कोई रिस्क न्यूट्रल होता तो यह सही प्रायिकता होती। लेकिन व्यवहार में चूंकि हर कोई रिस्क न्यूट्रल नहीं होता, इसलिए ये प्राय़िकताएं सच्चाई से संबंधित तो होती हैं, लेकिन सचमुच सच्ची नहीं होतीं।

अब हम रिस्क न्यूट्रल वैल्यूएशन के तरीके से ऑप्शन का भाव निकालते हैं। आसान तुलना के लिए उदाहरण वही लेते हैं जो पिछले लेख में लिया था। हमें 100 रुपए स्ट्राइक मूल्य के कॉल ऑप्शन का भाव दो नोड – पहले महीने और दूसरे महीने की एक्सपायरी को देखते हुए निकालना है, जबकि रिस्क-फ्री ब्याज की दर 10 प्रतिशत है। स्टॉक का मूल्य हर नोड पर 20 प्रतिशत ऊपर या इतना ही नीचे जा सकता है। दूसरे शब्दों में ऊपर जाने का फैक्टर u = 1.2 और नीचे जाने का फैक्टर d = 0.8 है, जबकि सकल रिस्क-फ्री फैक्टर R = 1.1 है।

रिस्क न्यूट्रल प्रायिकता को हम ऊपर या नीचे जाने की स्थिति में इस तरह परिभाषित करते हैं। लेकिन हम यहां फॉर्मूला निकालते या डेराइव नहीं करते, बल्कि उसे जस का तस ले लेते हैं:

ऊपर जाने की रिस्क न्यूट्रल प्रायिकता = πu = (R-d)/(u-d)

= (1.1 – 0.8)/(1.2-0.8) = 0.3/0.4 = 0.75

वहीं, नीचे जाने की रिस्क न्यूट्रल प्रायिकता = πd = 1 – πu = 1 – 0.75 = 0.25

ऑप्शन का भाव निकालने के लिए हम रिस्क न्यूट्रल पायिकता का उपयोग करते हुए दोनों नोड या महीने पर अपेक्षित पे-ऑफ निकालते हैं और फिर उसे रिस्क-फ्री ब्याज दर से डिस्काउंट कर देते हैं। साथ ही पूरी गणना में बैकवर्ड इंडक्शन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

बता दें कि पिछले लेख में हम देख चुके हैं कि दो नोड या महीने बाद स्टॉक का मूल्य बढ़ने पर कॉल ऑप्शन का अंतर्निहित मूल्य 44 रुपए निकलता है, जबकि घटने पर अंतर्निहित मूल्य शून्य या 0 रहता है। हम अब पहले t = 2 की स्थिति में, यानी दो बार बढ़ने/घटने पर कॉल ऑप्शन का भाव निकालते हैं। इसका फॉर्मूला है:

बढ़ने पर V(u) = [πu x V(uu) + πd x V(ud)]/R

= (0.75×44 + 0.25×0)/R = 1.1

= 33/1.1 = 30

घटने पर V(d) = [πu x V(ud) + πd x V(dd)]/R

= 0.75×0 + 0.25×0 = 0

ध्यान दें कि दूसरे नोड के मद्देनज़र कॉल ऑप्शन के यही भाव रेप्लिकेटिंग पोर्टफोलियो में भी निकले थे।

अब t = 0 की स्थिति में पहले नोड के मद्देनजर कॉल ऑप्शन का भाव निकालते हैं। इसका फॉर्मूला है:

V = [πu x V(u) + πd x V(d)]/R = (0.75×30 + 0.25×0)/1.1 = 22.5/1.1 = 20.45

इस तरह t = 0 पर 100 रुपए स्ट्राइक प्राइस वाले कॉल ऑप्शन का भाव इस तरीके से भी 20.45 रुपए निकलता है, जबकि t =1 पर ऑप्शन भाव 30 रुपए निकलता है। पिछले तरीके से भी यही निकला था। लेकिन आप गौर करेंगे कि यह तरीका बायनॉमिअल मॉडल के पिछले तरीके से काफी आसान है।

मोटे तौर पर ऑप्शन प्राइसिंग के बायनॉमिअल मॉडल की यह थी रूपरेखा। हम नोड की संख्या बढ़ा कर इसे और ज्यादा बारीकी से सीख सकते हैं। लेकिन व्यवहार में ऑप्शन के भावों के निर्धारण का ब्लैक-शोल्स मॉडल ही ज्यादा व्यावहारिक और प्रचलित है। इसलिए आगे हम कायदे से उसकी तह में पैठने की कोशिश करेंगे।

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