प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवा, महिला, गरीब व किसान की जो चार जातियां गिनाईं, उनकी सरकार इनमें से किसी की भी हितैषी नहीं है। दिक्कत यह है कि वो समूचे बिजनेस समुदाय की भी परवाह नहीं करती। उसे परवाह है तो चंद देशी-विदेशी उद्योगपतियों की, जो उन पर भरपूर चंदा और खजाना लुटाते हैं। साथ ही उनका एजेंडा संघ परिवार के तमाम अकर्मण्य लोगों को कहीं न कहीं सत्ता से जुड़ी कुर्सियों पर एडजस्ट कर देना है।औरऔर भी

मोदी सरकार बार-बार दंभ भरती है कि वह संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के 33% प्रतिनिधित्व का नारी शक्ति वंदन अधिनियम ले आई। वह इसे महिलाओं के सशक्तिकरण का बड़ा कदम बताती है। लेकिन इसमें ऐसे पेंच फंसा दिए हैं कि यह पांच साल बाद 2029 के आम चुनावों में भी शायद ही लागू हो पाए। वहीं, उसकी नीतियों से हो यह रहा है कि देश की श्रमशक्ति में नारी शक्ति की भागीदारी घटती जा रही है।औरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में किसानों से वादा किया था कि उन्हें फसल का इतना एमएसपी देंगे कि सारी लागत का आधे से ज्यादा मुनाफा मिल जाएगा। यह वादा हवाहवाई होने के बाद उन्होंने साल 2016 में घोषणा की कि किसानों की आय छह साल में दोगुनी हो जाएगी। यह घोषणा भी खोखली निकली। इस बीच वे 2020-21 में संसद में बिना बहस के पास कराकर तीन कृषि कानून ले आए जिसमें कृषि में कॉरपोरेटऔरऔर भी

क्या कोई व्यक्ति देश के शहरी इलाके में 1286 रुपए और ग्रामीण इलाके 1089 रुपए में महीने भर खाने-पीने, कपड़े-लत्ते और रहने के साथ ही स्वास्थ्य व शिक्षा का इंतज़ाम कर सकता है? आप कहेंगे कि इसका मतलब शहर में प्रतिदिन 42.87 रुपए और गांव में 36.30 रुपए में गुजारा करना, जो कि असंभव है। लेकिन भारत सरकार के नीति आयोग ने संयुक्त राष्ट्र संस्था यूएनडीपी के साथ मिलकर मल्टी डायमेंशन पॉवर्टी का यही पैमाना बनाया किऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18वीं लोकसभा चुनावों की घोषणा से कुछ महीने पहले विपक्ष की जातिगत जनगणना के अभियान को काटने के लिए कहा था कि देश में केवल चार ही जातियां हैं – गरीब, युवा, महिलाएं और किसान। सत्ताबल और धनबल के बावजूद मोदी की पार्टी भाजपा को जनता ने 543 सीटों की लोकसभा में से बहुमत से 32 कम केवल 240 सीटें ही दी है। आज मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में टीडीपी और जेडी-यूऔरऔर भी

इस समय ऊपर से नीचे तक देश का फ्रॉडकाल चल रहा है। जीडीपी डेटा में डिफ्लेटर के खेल और पीएमओ से जुड़े होने के नाम पर किरण पटेल, संजय शेरपुरिया व कश्मीरा पवार जैसे ठगों की करतूतों को अलग रखकर भी देखें तो वित्तीय जगत तक में फ्रॉड बढ़ता जा रहा है। लोकलसर्कल्स के एक ताजा सर्वे में 47% शहरी भारतीयों ने बताया कि वे खुद या उनके परिवार का कोई सदस्य पिछले तीन सालों में वित्तीयऔरऔर भी

देश इस वक्त विषमता के विचित्र दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जीडीपी बढ़ रहा है। दूसरी तरफ तीन-चौथाई से ज्यादा घरों की आय घटती जा रही है। लेकिन साथ ही भारतीयों का एक तबका विदेश में जाकर मौज-मस्ती करने पर जमकर खर्च कर रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसी मार्च में खत्म वित्त वर्ष 2023-24 में विदेश में भारतीयों का खर्च अब तक के सर्वोच्च स्तर 31.7 अरब डॉलरऔरऔर भी

राष्ट्रीय औसत यह है कि भारतीय लोग अपनी आय का 30% हिस्सा हारी-बीमारी या निवेश व आकस्मिक खर्चों के लिए बचाकर रखते हैं। लेकिन निम्न व मध्यम आय वाले घरों में ऐसी बचत 20% से भी कम रहती है। यह हकीकत रेडसीयर के सर्वे से सामने आई है। ऐसे परिवारों की अधिकांश आय खाने-पीने, इलाज और घर के किराए वगैरह पर खर्च हो जाती है। मध्यम वर्ग के 81%, उभरते मध्य-वर्ग के 78% और निम्न-आय वर्ग केऔरऔर भी

पिछले पांच साल में देश का जीडीपी 24.33% बढ़ा है, वो भी मुद्रास्फीति के असर को घटाने के बाद। हमारा जीडीपी वित्त वर्ष 2018-19 में ₹139.81 लाख करोड़ था। सरकार के ताजा अनुमान के मुताबिक 2023-24 में यह ₹173.82 लाख करोड़ रहा है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि देश के 81.35 करोड़ लोग (करीब 58% आबादी) अब भी महीने में सरकार के मुफ्त पांच किलो राशन पर गुजारा कर रहे हैं। हाल ही में आए सलाहकारऔरऔर भी

वित्त वर्ष 2021-22 और 2022-23 के बीच के जिन दो सालों में निफ्टी रीयल एस्टेट सूचकांक 200% बढ़ा है, उसी दौरान कंस्टक्शन क्षेत्र के मजदूरों की औसत मजदूरी घट गई। इसमें भी महिला मजदूरों की हालत ज्यादा खराब रही। इस क्षेत्र में लगभग 80% अकुशल मजदूर काम करते हैं, जिनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी निर्धारित है। लेकिन मशहूर संस्था सीईआईसी के डेटा के मुताबिक 15 से 20 राज्यों में यह न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती। जाहिरऔरऔर भी