कल शाम एक समझदार और अपेक्षाकृत ईमानदार ब्रोकर (क्योंकि ज्यादातर ब्रोकर केवल अपने धंधे के प्रति ईमानदार होते हैं, हमारे प्रति नहीं) से बात हो रही है। उनका कहना था कि हर समय हर किसी के लिए ट्रेड करने का नहीं होता। जैसे, इस समय जितनी वोलैटिलिटी चल रही है, निफ्टी दिन में अक्सर 200-250 अंक ऊपर नीचे होने लगा है, उसे देखते हुए हमें मैदान बड़ों के लिए छोड़ देना चाहिए। नहीं तो हम पिस जाएंगेऔरऔर भी

प्रोफेशनल ट्रेडर रिस्क नहीं लेते क्योंकि वे हमेशा शेयरों के ट्रेंड पर चलते हैं। 365, 200, 75 व 50 दिनों के सिम्पल मूविंग औसत (एसएमए) और फिर 20, 13 व 5 दिन के एक्सपोनेंशियल मूविंग औसत (ईएमए) से देखते हैं कि खास शेयर के भावों का रुझान क्या है। वे उठते शेयरों को खरीदते और गिरते शेयरों को शॉर्ट करते हैं। बाकी उछल-कूद मचानेवाले शेयरों पर ध्यान नहीं देते। अब देखें कि रुपया संभला, बाज़ार बढ़ा कैसे…औरऔर भी

क्या शेयर बाज़ार शुद्ध सट्टा है? हमारे तमाम सांसद यही मानते हैं। इसलिए वे नहीं चाहते कि पेंशन स्कीम का फंड शेयरों में लगे। नए लोगों को लगता है कि ट्रेडिंग में जबरदस्त थ्रिल व एडवेंचर है और यहां आसानी से नोट बनाए जा सकते हैं। जितना रिस्क, उतना रिटर्न! लेकिन हकीकत यह है कि थ्रिल, एडवेंचर और रिस्क उठानेवाले ट्रेडिंग में हमेशा मुंह की खाते हैं। प्रोफेशनल ट्रेडर रिस्क नहीं लेता। अब करें बाज़ार का रुख…औरऔर भी

आपको बहुतेरे लोग कहते मिल जाएंगे कि अच्छा-खासा स्टॉक भी उनके खरीदते ही गिरने लगता है। उन्हें लगता है कि शेयरों में कमाई किस्मत का खेल है। लेकिन दुनिया के दिग्गज ट्रेडरों का अनुभव बताता है कि यहां का मूल मंत्र कौशल और अनुशासन है। किस्मत तो कतई नहीं। किसी चमत्कारी इंडीकेटर या थ्योरी की खोज भी यहां बेमानी है। मायने है तो इसका कि आपने ट्रेडिंग के कौशल को कितना निखारा है। अब रुख बाज़ार का…औरऔर भी

हम सभी खुद को भीड़ से अलग समझते हैं। लेकिन आफत या अफरातफरी की हालत में भीड़ जैसा ही बर्ताव करते हैं। जब तक हम भीड़-सा बर्ताव करते रहेंगे, तब तक शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से नहीं कमा सकते। यह कोई दुस्साहसी काम नहीं है जिसमें लीक छोड़कर भीड़ से उलटा चलना पड़ता है। लेकिन यहां भीड़ से ऊपर उठना ज़रूरी है ताकि हम भीड़ की चाल को भांप सके। टेक्निकल एनालिसिस इसमें मददगार है। अब आगे…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग एक तरह का बिजनेस है। इसमें बराबर हर सौदे में मुनाफा कमाना संभव नहीं। यह दुनिया भर के अनुभवी ट्रेडरों का सबक है। कई बार घाटा उठाना पड़ता है। यह घाटा न्यूनतम हो, इसके लिए स्टॉप-लॉस का अनुशासन बना है। इसलिए हर ट्रेड में एंट्री के साथ-साथ स्टॉप-लॉस का स्तर तय करना ज़रूरी है। दरअसल, स्टॉप-लॉस के घाटे को इस बिजनेस की लागत माना जाता है। अब उतरते हैं आज के बाज़ार में…औरऔर भी

बाज़ार सरकार तक की नहीं सुनता। वित्त मंत्री चिदंबरम से लेकर रिजर्व बैंक तक रुपए को चढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इन सबको धता बताते हुए रुपया डॉलर के मुकाबले 68.83 तक जा गिरा। एक दिन में 3.83% की गिरावट। यह एक मार्च 1993 के बाद किसी एक दिन में हुई सबसे बड़ी गिरावट है। शेयर बाज़ार सपाट। सोना चढ़ा 34,238 रुपए प्रति दस ग्राम तक। सबक? बाज़ार से पंगा मत लो। बस देखते रहो बाज़ार की धार…औरऔर भी

डॉलर का 66.30 रुपए हो जाना सरकार की अदूरदर्शी नीतियों का नतीजा है। इसे संभालने का कोई शॉर्टकट नहीं। समस्या यह है कि भारतीय मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की उत्पादकता घट गई है। दुनिया में भारतीय मालों के पिटने से हमारा व्यापार घाटा 195 अरब डॉलर हो चुका है। सेवा उद्योग और अनिवासी भारतीय देश में 105 अरब डॉलर ला रहे हैं। इस तरह बची 90 अरब डॉलर की कमी कोहराम मचाए हुए है। फिर, कैसे बढ़े शेयर बाज़ार?औरऔर भी

हर दिन बाज़ार से घनेरों सूचनाएं निकलती हैं। इनमें से काम की सूचना निकालना और विश्लेषण करना कठिन है। फिर तमाम संकेतकों में इन्हें बैठा कर किसी नतीजे पर पहुंचना कठिन है। स्टॉक एनालिस्ट बनना भी कठिन है, बशर्ते यह नौकरी कहीं न मिल जाए। लेकिन ट्रेडिंग करना और भी कठिन है। चार्ट बना लिया। पर चार्ट का दाहिना हिस्सा खाली है। इसे भरने का हुनर अनुभव, अध्ययन, अभ्यास व अनुशासन से आता है। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी