हाईटाइड के वक्त रहें समुंदर से दूर

कल शाम एक समझदार और अपेक्षाकृत ईमानदार ब्रोकर (क्योंकि ज्यादातर ब्रोकर केवल अपने धंधे के प्रति ईमानदार होते हैं, हमारे प्रति नहीं) से बात हो रही है। उनका कहना था कि हर समय हर किसी के लिए ट्रेड करने का नहीं होता। जैसे, इस समय जितनी वोलैटिलिटी चल रही है, निफ्टी दिन में अक्सर 200-250 अंक ऊपर नीचे होने लगा है, उसे देखते हुए हमें मैदान बड़ों के लिए छोड़ देना चाहिए। नहीं तो हम पिस जाएंगे और हमारी बड़ी मेहनत से जुटाई गई ट्रेडिंग पूंजी ही उड़ जाएगी। आखिर हम कहां-कहां और कितना स्टॉप लॉस लगाते फिरेंगे?

मुझे भी उनकी बात वाजिब लगी। हम बड़ों की पूंजी और सौदों की स्पीड/तेज़ी का मुकाबला कतई नहीं कर सकते और जबरदस्त उतार-चढ़ाव के बीच यहीं चीजें कामयाबी दिलाती हैं। इसलिए प्रतिद्वंद्वी जब ज्यादा ताकतवर हो तो मैदान छोड़कर तमाशा देखना ही लाभकारी है। हम कोई गुरिल्ला योद्धा तो हैं नहीं और न ही ट्रेडिंग कोई युद्ध है कि छिपकर वार कर बड़ी सैन्य ताकत को भी मात दे सकें। बाज़ार से दूर रहने से हमारी ट्रेडिंग पूंजी तो सलामत रहेगी।

बाज़ार में यह वोलैटिलिटी कब तक चलेगी? कम से कम इस पूरे महीने क्योंकि सीरिया पर अमेरिकी हमला और बेन बरनान्के की तरफ से बाज़ार से बांड खरीद का सिलसिला धीमा करने की घोषणा कभी भी हो सकती है। ये दो बड़ी बातें दुनिया समेत भारतीय बाज़ार के लिए बहुत मायने रखती हैं। सेंट पीटर्सबर्ग में जी-20 देशों के नेता भले ही सीरियाई अवाम पर खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल करनेवाली असद सरकार के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का विरोध करें और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सर्वोपरि होने का दावा करें, लेकिन हकीकत यही है कि बराक ओबामा ही नहीं, पूरी अमेरिकी संसद सीरिया पर हमला चाहती है ताकि हथियारों की ताकतवर लॉबी का ‘उपकार’ किया जा सके।

इन अनिश्चितताओं के बीच भारत सरकार या रिजर्व बैंक जो भी अच्छा कदम उठाएंगे, उसका असर क्षणिक ही होगा। कुछ दिनों के बाद फिर अमेरिकी हरकतें हमारे बाज़ार को ताता-थैया कराने लगेंगी। दिक्कत यह है कि रिजर्व बैंक के नए गवर्नर रघुरान राजन या हमारे वित्त मंत्री पलानिअप्पन चिदंबरम भले ही दिमागदार लोग हों, शांति चाहते हों, लेकिन बड़े ट्रेडर बहुत पहुंचे हुए हैं और अफरातफरी मचाकर कमाना चाहते हैं। वे तिल का ताड़ बनाना बखूबी जानते हैं क्योंकि यह उनकी ‘पापी आंत’ का सवाल है। ऐसे दौर में लंबे निवेश के लिए अच्छे शेयरों को पकड़ने की नीति सबसे फायदेमंद रहेगी। ट्रेडिंग करना दुस्साहस का काम नहीं है। दुस्साहसी लोग बाज़ार में कमाते नहीं, अक्सर मात ही खाते हैं।

मालूम हो कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की एक टीम के अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में ब्रोकरों की प्रापराइटरी यानी खुद अपने धन के दम पर की गई ट्रेडिंग का हिस्सा एनएसई के कैश मार्केट टर्नओवर का 26 फीसदी और बीएसई के कैश मार्केट टर्नओवर का 23 फीसदी है। सेबी ने यह रिपोर्ट हाल ही में जारी की है और उसने आईएमएफ टीम को बताया है कि ब्रोकर इतनी ट्रेडिंग आमतौर पर उधार लेकर नहीं, बल्कि अपने धन से करते हैं।

ब्रोकरों की यह ताकत उन्हें हमारे शेयर बाज़ार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) और घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) के बराबर ला खड़ा करती है। डेरिवेटिव सेगमेंट में तो ब्रोकरों और उनके एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल) क्लाएंटों का ही साम्राज्य है क्योंकि वहां एफआईआई उनसे दबे हुए हैं और डीआईआई को इस सेगमेंट में उतरने की वैधानिक इजाज़त है नहीं। यह भी एक अघोषित सत्य है कि ब्रोकरों के जरिए ही राजनेताओं का बेनामी धन शेयर बाज़ार में लगता है। हो सकता है कि ब्रोकर का धन उसका नहीं, बल्कि किसी बड़े राजनेता का हो।

अपने बाज़ार में ऐसी तमाम विसंगतियां हैं। विकसित देशों में अमूमन ब्रोकर का धंधा ब्रोकिंग ही होता है। वे प्रॉपराइटरी ट्रेड से दूर ही रहते हैं। लेकिन अपने यहां जो स्टॉक्स वे ग्राहकों से खरीदवाते हैं, उन्हें खुद बेच रहे होते हैं। चूंकि राजनेताओं का बेनामी धन इस तरीके से बाज़ार में आता है, इसलिए इसे रोकने का कोई इंतज़ाम नहीं है। कंपनियों से लेकर सरकार और बैंक, बीमा कंपनियों और एफआईआई तक क्या फैसले लेने जा रहे हैं, इसका पता दो से चार दिन पहले ही ब्रोकर फर्मों के आला अधिकारियों को चल जाता है। बहुत सारी ब्रोकिंग व फाइनेंस की फर्में तो कालेधन को सफेद करवाने के लिए बनी हुई हैं।

आप कहेंगे कि मगरमच्छों से भरे ऐसे तालाब में तैरने के उतरा ही क्यों जाए! सही बात है। लेकिन गलत लोगों के जमने और गड़बड़ियों से कोई काम, कोई धंधा हमेशा के लिए गलत और त्याज्य नहीं हो जाता। शेयर बाज़ार एक माध्यम है जोखिम पूंजी या रिस्क कैपिटल को उद्योग-धंधों तक पहुंचाने का। इसकी यह भूमिका हमेशा बनी रहेगी। इसका कोई विकल्प नहीं। मगरमच्छों की खाल भले ही मोटी हों, लेकिन हमारे ब्रोकर-ट्रेडरों की चमड़ी दरियाई घोड़ों जैसी नरम है, भावनाओं में लिपटी है। वे शातिर मानसिकता के हो सकते हैं, लेकिन दिमागदार नहीं हैं। वे औरों में लालच और डर फैलाकर अपनी झोली भर सकते हैं। लेकिन भावनाओं पर तैरकर बाज़ार में शिकार नहीं कर सकते। वे अपनी गलाजत और चालाकी के चलते बुद्ध नहीं बन सकते। इसलिए हम बुद्ध बनकर उनका भी शिकार कर सकते हैं। आमीन! तथास्तु!!

Leave a Reply

Your email address will not be published.