पीपल की पत्तियां जरा-सी हवा पर उछलने-कूदने लगती हैं। वहीं बरगद और उसकी पत्तियां बड़े से बड़ा तूफान भी शांति से झेल जाती हैं। लेकिन जीवन में दोनों की अपनी जगह है, अपनी अहमियत है।और भीऔर भी

एक व्यक्ति विशाल संस्था से कैसे लड़ सकता है? अकेला चना भाड़ कैसे फोड़ सकता है? लेकिन अंधेरे को चीरने के लिए एक दीया ही काफी है। रावण की लंका जलाने के लिए एक हनुमान ही काफी होता है।और भीऔर भी

जब मूल वस्तु ही स्थिर नहीं तो उसकी छाया कैसे स्थिर हो सकती है? दुनिया में सब कुछ हर पल बदल रहा है तो हमारे विचार कैसे स्थिर रह सकते हैं? पीछे छूट गए बच्चे की तरह उन्हें साथ ले आना जरूरी है।और भीऔर भी

बड़ा आसान है निष्कर्षों में सच को फिट करके संतुष्ट हो जाना। लेकिन सच से निष्कर्षों को निकालना उतना ही मुश्किल है क्योंकि अपने करीब पहुंचते ही सच खटाक से नई-नई परतें खोलने लग जाता है।और भीऔर भी

आदतों को मोड़ना बड़ा कठिन है, लेकिन बेहद आसान भी। ऊपर से ठोंक-ठोंककर मनाएंगे, आदत जाने का नाम नहीं लेगी। लेकिन अंदर से ज़रा-सा इशारा करेंगे तो टनों का पूरा इंजिन मुड़ता चला जाएगा।और भीऔर भी

लाभ कमाने की मंशा किसी भी समाज में इंसान को आत्मकेंद्रित, अनैतिक, यहां तक कि अपराधी तक बना सकती है। काश, हम दूसरे की भलाई के लिए ही काम करते और उसी में हमारा भी भला हो जाता।और भीऔर भी

बुद्धि के बिना हम क्षितिज के पार नहीं देख सकते। इसीलिए हमारी याददाश्त भी बड़ी कमजोर होती है। इसका फायदा दुष्ट लोग उठाते हैं। वे बार-बार संत का भेष बनाकर आते हैं और हमें लूटकर चले जाते हैं।और भीऔर भी

हमें अपने पूर्वजों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों का नहीं, उनके जुझारूपन का कायल होना चाहिए। जब खुद वे शाश्वत नहीं रहे तो उनके निष्कर्ष कैसे शाश्वत हो सकते हैं। हां, उनका जुझारूपन जरूर शाश्वत है।और भीऔर भी

मैं किसी के पास पूछने नहीं गया कि उसे क्या चाहिए। मैं अपने में डूबा तो डूबता ही चला गया और गहरी डुबकी के बाद जो निकाल कर लाया तो सभी जोर-जोर से कहने लगे – अरे यही तो हमें चाहिए था।और भीऔर भी

अंदर या बाहर, कहीं से जड़ता से निकलने का मतलब है एक चुम्बकीय क्षेत्र को तोड़ना। इसके लिए या तो निरतंर घर्षण से नया चुम्बक पैदा करना पड़ता है, नहीं तो कोई बड़ा चुम्बक खींचकर लाना पड़ता है।और भीऔर भी